बचपन की चिंता किसी को नहीं

भारत में सैकड़ो त्यौहार की तरह ही अनेको दिवस का आयोजन बड़े धूम -धाम से होता है. इसी तरह का एक आयोजन विश्व बाल श्रम दिवस के अवसर पर भी हुआ. कई सरकारी विभागों ने कार्यक्रम आयोजित कर खान-पूर्ति कर ली. पर शायद बचपन की चिंता किसी को नहीं है. लोग आयें और भाषणों का दौर चला, गहरी चिंता व्यक्त की और नास्ता किया, लोगों से संपर्क बढ़ने के लिए एक दुसरे के कार्य की तारीफ की और निकल लिए. यही हर आयोजन की उपलब्धि है.

यहाँ सिर्फ सरकार को दोषी बता देने से भी काम नहीं चलने वाला है. समाज की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. पर ऐसा क्या  है  कि  बाल श्रम रुक नहीं रहा है. इसके पीछे भारतीय समाज में आ रहे बदलाव और अर्थव्यस्था की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता. आज ग्रामीण अर्थव्यस्था का बुरा हाल है. गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. लोगों के पास बारह महीने के लिए काम नहीं है. कृषि का क्या हाल है इसका अनुमान  देश भर में चल रहे किसान आंदोलनों से लगाया जा सकता है. किसान के पास मौत को गले लगाने के अलावा कोई चारा नहीं है. जहा मौत से लड़ाई चल रही है वह के किसान, मजदूर का बच्चा आसपास के शहरों में जाकर मजदूरी कर अपना और परिवार का पेट पालने का काम कर रहा है.

सरकार कल्याणकारी योजना चला कर अपना पल्ला झाड़ लेती है. बोलने के लिए तो हर जिले में बाल विकास केंद्र की स्थापना की गयी है पर उसकी हालत का जायजा लेने के लिए न तो सरकार, न समाज और न ही मीडिया के लोग वहा पहुचते है. शहरों में चाइल्ड लाइन के माध्यम से मिलने वाले बच्चों को गैर सरकारी संस्थानों तक पंहुचा देने की जिम्मेदारी निभाने और कुछ अनुदान देकर सरकार इतिश्री कर लेती है. अपनी पीठ थपथपाने के लिए काफी है. पर बच्चों के हाल पर इनकी नज़र नहीं पड़ती.

हाल ही में यूपी सरकार के श्रम और सेवायोजन मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या ने नया  सवेरा  योजना की शुरुआत की है. उन्होनो ने यूपी के बीस जिलों के करीब एकहजार गांवों को चिन्हित किया है और घोषणा की है कि जल्द ही यूपी को  बाल श्रम के अभिशाप से मुक्त करा दिया जायेगा.  इसी क्रम में यूनिसेफ के लखनऊ हेड, रुथ लैस्कैनो लीनो  ने भी विधान सभा स्पीकर से मिलकर प्रदेश में बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने, उनके स्वास्थ, शिक्षा, पेयजल और कई समस्याओं से निजात दिलाने में यूनिसेफ की सहायता की पेशकश की और सरकारी तंत्र की ओर से मदद का आश्वाशन लिया.

आज अगर नज़र डालें तो सैकड़ो संस्थान काम करते हुए दिख जायेंगे पर क्या कारण है  कि  बच्चों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा है. सीधी सी बात है, अगर हम सरकार की एक योजना मिड डे मील को  ही ले लें तो पाएंगे की भोजन करने के लिए तो बच्चें स्कूलों में आते है. पर उनका ध्यान पढ़ने की जगह खाना लेने और खिसक लेने पर ज्यादा होता है. शिक्षक भी सरकार की योजना पर अंधभक्ति करते हुए उसे आगे बढ़ता रहता है. रिपोर्ट दर रिपोर्ट मिड डे मिल की उपलब्धियों का खाका खिचां जाता है. पर  बच्चा जस का तस वही पर विकास की गंगा में गोतें लगा रहा होता  है.  तैरना तो दूर वो अपनी जगहं से एक इंच दूर भी विकास की गंगा में नहीं पहुच पाता .

बचपन को बचाने के लिए एक समेकित कार्य बल की जरुरत है. सरकार और समाज की विभिन्न इकाइयों को एक होकर कम करना होगा. पहले प्राथमिकता तय कर ये निश्चित किया जाना चाहिए की ऐसी कौन सी जरुरत है जो बच्चों से उनका बचपन छीन रही है. उसपर प्रहार कर बच्चों को मुक्त करने की पहल समाज में इनके जीवन स्तर को उपर उठा सकती है.

मीना पाण्डेय

प्रबंध संपादक