जानिए हिंदी के सबसे बड़े विरोधी राजनेता को, जिसका जन्मदिन हिंदी दिवस के एक दिन बाद ही पड़ता है

बचपन एक्सप्रेस वेब डेस्क :आज सी एन अन्नादुरै का जन्मदिन है. एक ऐसा राजनेता जिसने दक्षिण की राजनीति को सिर के बल पर उलट दिया. वो तमिलनाडू के प्रथम गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे. कलम जितनी ज़ोरदार आवाज़ उतनी ही रेशमी और वक्ता शैली इन दोनों से ज्यादा धारदार. अन्ना, रामास्वामी पेरियार के चेले थे और आत्मसम्मान आन्दोलन और जस्टिस पार्टी से होते हुए वो द्रविड़ कजकम का हिस्सा हुए फिर 1949 में पेरियार से अलग हो गए और अपनी खुद की पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कजकम अलग पार्टी बना ली. इस आन्दोलन ने अलग तमिल राष्ट्र, हिंदी विरोध और उत्तर भारतीय वर्चस्व के विरूद्ध अपनी राजनीति लाइन सेट की. पेरियार और सी एन अन्नादुरै के प्रभाव ने पूरे दक्षिण की राजनीतक भाषा, उसका मुहावरा और जनमानस की चेतना ही बदल कर रख दिया. पेरियार की रेडिकल पोलिटिकल लाइन जब अन्ना के रूप में 1967 में सत्ता में आये तो उनका टोन मोडरेट होने लगा और जो आवाज पृथक द्रविड़ राष्ट्र की मांग कर रही थी उसमे राष्ट्रीय एकता की भावना देखी जाने लगी. उन्होंने हिंदी को स्कूलों में पढ़ाने की इजाजत दे दी. ये विडम्बना ही है कि हम 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मानते है और हिंदी दिवस के एक दिन बाद ही हम अन्ना का जन्मदिन मानते हैं. अन्ना का तमिल राजनीति में प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मृत्यु के बाद एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने अलग पार्टी बनाई तो उसका नाम अन्ना के नाम पर ही रखा, आल इण्डिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कजकम (एआइडीएमके) और बाद में ये पार्टी पहले एमजीआर और फिर बाद में जयललिता के नेतृत्व में तमिलनाडु में सत्ता में आई. सी एन अन्नादुरै ने तमिलनाडु में फिल्म और राजनीति को इस तरह जोड़ दिया. और ये ट्रेंड जयललिता तक चलता चला आया. सी एन अन्नादुरै एक कुशल लेखक, महान राजनेता, जननायक, अभिनेता और समाजसुधारक थे. सी एन अन्नादुरै का निधन तीन फ़रवरी 1969 को हुआ. वो इस दुनिया से चले गाये पर दक्षिण की राजनितिक चेतना पर आज भी उनकी छाप और प्रभाव शेष है. सी एन अन्नादुरै की शव यात्रा में ऐसा जन सैलाब उमड़ा की उनकी शव यात्रा गीनिज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज की गयी.