नोटबंदी के खिलाफ झूठे हल्ला बोल की पोल खोल

Demonetization is a very important event in regards to financial accountability in India.
Demonetization is a very important event in regards to financial accountability in India.

 

आर बी आई के नोटबंदी के आंकड़े सामने आतें ही कई राजनितिक पार्टियों और सोशल मीडिया पर इसकी विफलता की चर्चा होने लगी. नोट बंदी के कारण जनता को कष्ट हुआ था जिसे महादेव की तरह लोक कल्याण के लिए विष समझ कर जनता ने पी लिया था. पर इसको पूरी तरह नकार देने में ऐसे लोगों की साजिस नजर आती है जिनके पैसे दूसरों के खातों में मौज मना रहे  है.

नोट बंदी के दौरान सामान्य चर्चा जो होती थी उसमे रोज कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता था जो इस जुगाड़ में लगा था कि कैसे अपने पुराने नोट को सलटा दे. इस खोज में कई बार हमलोग खुश हुआ करते थे कि चलो हमारे पास तो सिर्फ पंद्रह हजार ही है और हमें कोई परेशानी नहीं होगी. पर बड़ा ही आश्चर्य हुआ की वो लोग जिनके पास खूब कला धन था वो भी खुश थे. इसका मतलब ये हुआ की उन दिनों कुछ ऐसा जरूर हुआ होगा जिससे कला धन को ठिकाने लगाने का प्लान कामयाब हो गया होगा.

एक पत्रकारिता शिक्षक होने के नाते जब आस पास लोगो से पूछा तो पता चला की सच्चा लोकतंत्र तो नोट बंदी के बाद आया है. प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक हमेशा ये दुखड़ा रोया करते थे कि उनको सैलरी समय से नहीं मिलती पर नोट बंदी ने उन्हें कई महीनो की सैलरी एडवांस में दिला दी. और ये सिर्फ यही तक नहीं था कही लोगो ने अपने सालों के कर्ज को चुकता कर कई सरकारी संस्थानों को माला माल कर दिया.

हद तो तब हो गयी जब कई व्यापरी उन गरीबों को खोज खोज कर निकलने लगे जिनके अकाउंट में पैसा नहीं था. ये उन गरीबों के लिए इन्तहा नयी बात थी की उनको सदा तिरस्कार देने वाले मालिक आज उनसे प्यार से न सिर्फ बातें कर रहे है पर उनको उनकी सैलरी के साथ साथ कर्ज भी वो भी ब्याज मुक्त देने को तैयार थे. अब ऐसे जान कितने मालिकों की कृपा भारत के गरीब नौकरों पर हुई होगी जिन्हें नोट बंदी ने ब्याज मुक्त कर्ज प्रदान किया होगा. हम मोदी को कोस रहे है पर भारत के इतिहास की इस नवीनतम घटना से अपने आप को दूर किये हुए है. क्यों एका एक गरीबों के खतों में पैसा बाढ़ के पानी की तरह बढ़ने लगा. ये अपने आप में शोध का विषय है. सरकार को इन सभी लोगों को जवाब देने के लिए एक ऐसे शोध की जरूरत है जो ये बात सके की नोट बंदी के दौरान कहाँ कहाँ पैसे की बाढ़ आयी.

करीब करीब तीन लाख करोंण  का धन दूसरों के खातों में जमा कराया गया है. जिस पर आर बी आई को जांच करनी चाहिए. अब नोट बंदी के कारण बैंक खतों में आये पैसे की ट्रैकिंग होनी चाहिए जिससे दूध का दूध और पानी एक पान लोंगो के सामने आ जाये. सिर्फ सरकार को गाली देने से कुछ हासिल होगा. जनता को सोचना चाहिए कि वो लोग जो नोट बंदी के समय अपने पैसे को खपाने के लिए खाते ढूंड रहे थे उनकी जानकारी समय से सरकार को दे दी होती तो आज आम जनता चैन की सांस ले रही होती. आब भी ज्यादा समय नहीं हुआ है अपने आस पास में जिन लोगों, संस्थाओ ने लोगों के खतों में धन जमा किया है उसकी जानकारी सरकार को देकर लोकतन्त्र  को मजबूत किया जा सकता है.

मुझे इस बात का पूरा यकीन है की सरकार के पास आकंडे होंगे और इन लोगों की धरपकड़ कर नोट बंदी के सही मायने समझा दिया जाने चाहिए. इसमें हो सकता है की सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ के कुछ बड़े नाम भी आ जाये पर आम आदमी को हुए कष्ट को मरहम तभी मिलेगा जब कुछ नोट बंदी की मुखालफत करते बड़े नाम की सच्चाई लोगों के सामने आ जाये.