भारतीय सिनेमा में  स्त्री अपराधबोध का चित्रण

 

भारतीय सिनेमा में नारी का स्थान सिर्फ प्रेमिका, माँ, बहन और अन्य चरित्र प्रधान पात्रों तक सीमित रहा है. स्त्री- सिनेमा के इतिहास में अपनी इज्जत को बचाती, सती – सावित्री का किरदार बखूवी निभाती रही |  कभी भी उसके सपनो को पंख लगाने की कोशिश किसी भी डायरेक्टर ने नहीं की |  जहा एक ओर हीरो कई हेरोइन के साथ इश्क फरमाता था वही अगर हेरोइन किसी कारण से किसी और से लगाव दिखा बैठे तो डायरेक्टर उसके अंदर इतना अपराध बोध भर देता था कि समाज की महिलाएं ऐसा सोचने का साहस भी न कर सके |

अछूत कन्या में मुख्य स्त्री पात्र सिर्फ इस बात के लिए दो लोगों के बीच फंसी रहती है कि उसका शादी से पूर्व किसी और से प्रेम सम्बन्ध था |  सिर्फ इसके कारण वो अपने पति की प्रताड़ना सहती है |  कस्तूरी (देविका रानी ) का पति पहले से ही शादी शुदा है पर वो इस बात को छुपा कर दूसरी शादी कर लेता है |  कस्तूरी ने प्रेम करने की सजा, अपनी जान दे कर निभाई | डायरेक्टर को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की किसी की दो शादी को वो कितने सहज रूप से दिखा देता है. इस तरह के विसुअल समाज में पुरषवादी सोच को बढ़ावा देते रहे है. स्त्री को प्रेम में असहज और पुरुष को दुबारा शादी के बाद भी दूसरी स्त्री के लिए मरने- मारने पर आमादा व्यक्ति का चित्रण, हिंदी सिनेमा में स्त्री चरित्र के साथ घोर अत्याचार को दर्शाता है|

ये सिर्फ यही पर नहीं रुकता. स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद भी सिनेमा में स्त्री मुक्त नहीं होती. हिंदी सिनेमा के बड़े अभिनेता राजकपूर और राजेंद्र कुमार अभिनीत फिल्म संगम में भी स्त्री अपराध बोध को मुख्य बिंदु बना दिया गया. परिस्थितियों के कारण स्त्री को न सिर्फ अपनी पसंद का त्याग करना पड़ता है बल्कि उस व्यक्ति के साथ जीवन गुजरना पड़ता है जिसे वो अपने पति के रूप में पसंद नहीं करती थी. सुंदर (राजकपूर), गोपाल (राजेंद्र कुमार) और राधा (वैजयन्ती माला) तीनो बचपन के मित्र है. बड़े होकर सुंदर के मन में राधा के प्रति प्रेम भाव प्रकट होता है जिसे वो अपने दोस्त गोपाल को बता देता है. इस बीच राधा और गोपाल एक दुसरे को चाहने लगते है और शादी करना चाहते है.

पर सुंदर उनके बीच आ जाता है. सुंदर ने गोपाल से वादा लिया कि वो उसके ड्यूटी पर से आने तक राधा और उसके प्रेम सम्बन्ध के बीच किसी को आने नहीं देगा. सुंदर के प्लेन क्रैश हो जाने और उसे मरा घोषित हो जाने के बाद गोपाल और राधा अपने पारिवारिक जीवन का सुभारम्भ करने ही जा रहे थे कि सुंदर वापस आ जाता है और गोपाल अपने आप को राधा की जिन्दगी से दूर कर देता है. सुंदर और राधा की शादी हो जाती है. इस बीच राधा, गोपाल से कहती है कि वो उससे दूर रहे क्योकि उसकी उपस्थिति में उसे दुविधा होती है. संगम की स्त्री दो पुरुष के बीच एक वस्तु की तरह है जिसके पास निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. वो प्यार तो गोपाल से करती है पर शादी सुंदर से करती है. उसकी अपनी पसंद उसके उपर बोझ और अपराधबोध से दबा हुआ है. स्त्री का स्वतंत्रता के बाद भी अपनी सोच विकसित नहीं कर पाना सिनेमाई सोच में पुरुषवादी मानसिकता का प्रतीक  है. स्त्री १९३६ में प्रदर्शित फिल्म अछूत कन्या के अपने पात्र से बाहर नहीं निकल पाई थी. जो अपराध बोध उसे स्वतंत्रता के पूर्व अपने अस्तित्व को लेकर था उसी अपराध बोध से वह १९६४ में भी नहीं निकल पायी थी.

कुछ इसी तरह की मानसिकता हमें कमोबस हर फिल्म में दिखाई पड़ती है . स्त्री सदियों से अग्नि परीक्षा देते आई है और पुरुष एक तरफ खड़ा उसे समाज और सिद्धांतो के नाम पर परीक्षा लेता रहा है. पुरुष प्रधान समाज में सिनेमा भी उसी मानसिकता में लिप्त दिखाई पड़ता है. स्त्री स्वतंत्रता को लेकर जिसतरह का अपराधबोध सिनेमा ने सृजित किया है उसका दुस्परिणाम हमे समाज में स्त्री पर हो रहे हमलों और अपराधो की बढती संख्या में दिखाई पड़ता है.

हिंदी फिल्मों की कहानी में स्त्री चरित्र को ज्यादातर समय कमजोर और प्रताड़ित दिखाने और उसकी मुक्ति के लिए किसी नायक का आना सामाजिक जीवन में एक ऐसा चित्र गढ़ देता है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाती  है. कभी पति के जीवन के लिए लड़ते या फिर भाई की एक कमजोर बहन जिसका बलात्कार खलनायक करता है और वह स्वयं लड़ने की जगह अपने भाई को पुकारती हुई अत्याचार सहती है. ये सब बाते हिंदी फिल्मों में आम दृश्य है. इन दृश्यों का स्त्री के सामाजिक जीवन पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है. कमजोर स्त्री चरित्र हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी खासियात के रूप में दिखाई पड़ता है. ऐसा नहीं है की डायरेक्टर्स ने स्त्री को इस कमजोरी से मुक्ति दिलाने का प्रयास नहीं किया है. श्याम बेनेगल ने अंकुर में शबाना आजमी के दलित पात्र की भूमिका को एक मजबूत स्त्री चरित्र के रूप में प्रस्तुत किया था. अपने शराबी पति को कोसती वह घर के दायित्वों को बखूभी निभाती है. पर पति के भाग जाने के बाद जमींदार पुत्र के साथ संबंधो में भी वो सहज दिखाई पड़ती है. वो इस बात का अपराधबोध नहीं पालती है कि उसका किसी और से सम्बन्ध है.Image result for ankur

वही दूसरी ओर जमींदार की पत्नी और बहू दोनों उच्च कुल में जन्म लेने के बाद भी कमजोर है और अपने पति के कर्मो को अपना भाग्य मान लेती है. पत्नी के सामने ही परस्त्री सम्बन्ध को पसंद न होते हुए भी स्त्री पात्र को ही चोट पहुचाना समाज में पुरुष प्रधानता को स्वीकार करता दिखाई देता है. स्त्री ही स्त्री को दोषी मानती है और पुरुष के कृत्य का विरोध करने की जगह वो उसके प्रभाव में दिखाई देती है. अपने पति के पर स्त्री संबंधो में स्त्री की लाचारी, अपराधबोध ग्रस्त मानसिकता , कमजोर स्त्री का चरित्र है. वो न चाहते हुए भी अपने पति के संबंधो को न सिर्फ स्वीकार करती दिखाई पड़ती है बल्कि इसके लिए वो दूसरी स्त्री को ही दोषी मानती है.

फिल्मों में इस तरह का चित्रण स्त्री की सामाजिक दशा को इंगित करता है. भारतीय समाज में स्त्री अभी भी अपनी सती- सावित्री के चरित्र को ढो रही है. अपने सतीत्व को बचाए रखने की जिम्मेदारी और पति के पास कुवारी कन्या के रूप में पहुचना ही उसका उद्देश्य दिखाई देता है. अगर स्त्री के पुरूष साथी है तो वो चरित्रहीन हो जाती है. पर पुरुष पात्र को इस बात की छूट है कि वो कई स्त्रियों से सम्बन्ध बनाये और उसे सामाजिक मान्यता भी हो. हिंदी सिनेमा की शुरुआत से आज तक हीरो स्त्री पात्र का रक्षक रहा है. इस क्रम में उसे इस बात की छूट मिल जाती है कि वह अपनी पुरषवादी सोच को स्त्री पात्र के उपर थोप सके. स्त्री के अन्दर अपराधबोध को बढ़ावा देती तस्वीरों को जिन्दा रखने का काम हिंदी सिनेमा ने किया है. समाज को एक ही तरह के चित्र दिखाते रहना और पात्रों को इस तरीके से रचना कि स्त्री अपने आप, खुद को समाज में हो रहे गुनाहों के लिए जिम्मेदार मान ले. आज भी बलात्कार होने के बाद स्त्री ही कटघरे में खड़ी दिखाई देती है. समाज के जाने माने लोग ये कहने से गुरेज नहीं करते की बलात्कार के लिए कही स्त्री का पहनावा तो कही  उसकी सोंच जिम्मेदार है. बड़े परदे पर पति से मार खाकर भी उसकी रक्षा का संकल्प लिए, उसके लिए अपना सब कुछ लुटाना ही स्त्री का दायित्व है. ऐसी सोच का सिनेमा समाज को कैसे आगे लेकर जायेगा ये एक सोचनीय प्रश्न है.

स्त्री चरित्र : उपभोग और मनोरंजन की वस्तु

हिंदी सिनेमा में स्त्री पराधीन और पुरुष के उपभोग और मनोरंजन  का साधन है. हर साल हजारों फिल्मों में लगातार स्त्री कही किसी के बिस्तर पर पुरे मनोयोग से तो कहीं दुखी होकर पड़ी रहती है. उसका प्रतिरोध पुरुष के निचे दबा हुआ दम तोड़ता दिखाई देता है. लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का की मुस्लिम स्त्री चरित्र का संघर्ष अपने नकारे पति के नीचे दबा हुआ है. पति से छुप कर काम करना और अपनी गृहस्थी को चलाते हुए भी वो हर पल पति की मोहताज़ है. पति जो दूसरी स्त्री के साथ सम्बन्ध भी बनाये हुए है अपनी स्त्री को भी बिस्तर पर जबरदस्ती रौंदता दिखाई देता है. उसका यह कथन की औरत हो औरत की तरह रहो मर्द बनने की कोशिश न करो, सिनेमा में पुरुष की प्रधानता और औरत पर अत्याचार की दासता दिखाता है.  यह फिल्म औरत को आजाद करने की एक अच्छी कोशिश है पर दर्शको का इस फिल्म को पूरी तरह स्वीकार न करना समाज में व्याप्त पुरुषवादी सोच को ही प्रश्रय देता दिखाई पड़ता है. पर  क्या है की सिनेमा को स्वतंत्र और स्वछन्द स्त्री चरित्र कभी पसंद नहीं आया. अगर स्त्री स्वछन्द दिखाई देती है तो वो या तो तवायफ है या कुलटा. शारीरिक स्वतंत्रता सिर्फ पुरुष के हिस्से ही दिखाई पड़ता है, स्त्री खाली हाँथ पुरुष की ओर निहारती अपने आप को उसके उपर निछावर करने को तैयार दिखाई पड़ती है. लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म में जब एक प्रौढ़ महिला अपने शारीरिक संबंधो के लिए मोबाइल पर किसी युवा से बात करती है तो उसे समाज में विकृति फ़ैलाने वाला चित्र मान लिया जाता है. जब उस युवा को पता चलता है कि उससे बात करने वाली स्त्री एक प्रौढ़ महिला है तो उसकी सहानभूति कटुता में बदल जाती  है. मोहल्ले में सभी को अपनी बात और प्रौढ़ स्त्री से अपने संबंधो की चर्चा करते हुए उस युवा को कही भी अपराधबोध नहीं है अगर किसीने अपराध किया है तो वो  प्रौढ़ स्त्री है. समाज भी उसे अपराधी मानते हुए बुरा सलूक करता है. लोगों का ये कहना की इस उम्र में भी तुम्हे आग लगी हुई है एक तरह से स्त्री की भावनाओ को पूरी तरह से कुचलना है. एक तरफ एक प्रौढ़ अभिनेता अपने से आधी उम्र की स्त्री से इश्क लड़ाता दिखाई देता है तो वही दूसरी ओर अगर एक प्रौढ़ महिला किसी कम उम्र लड़के से बात करले तो सामाजिक भूकंप आ जाता है.

दीपक तिजोरी निर्देशित फिल्म ऊप्स में स्त्री चरित्र का अपने से कम उम्र के लड़के से सम्बन्ध स्थापित करना और फिर उसे छोड़ देना स्त्री की शारीरिक स्वतंत्रता को दर्शाती एक पोस्ट मॉडर्निस्ट फिल्म है. पर इस फिल्म में भी स्त्री के उपर अपराध बोध हावी होता दिखाई पड़ता है. इस फिल्म में जहान एक डांसर है. उसकी महिला मित्र निक्की और बचपन का मित्र आकाश साथ मिलकर एक डांस ग्रुप बनाना चाहते है. वही जल्दी पैसा कमाने के लिए जहान ऐसी पार्टियों का हिस्सा बन जाता है जहाँ पर उम्रदराज और पैसे वाली महिलाएं उससे न्यूड डांस और अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति करती है. वही जहान की मुलाकात एक प्रौढ़ उम्र की स्त्री से होती है और दोनों में शारीरिक सम्बन्ध बन जाते है. जहान का प्रेम उसके लिए बढ़ता ही चला जाता है. एक दिन एकाएक वो स्त्री गायब हो जाति है. जहाँन परेशान होकर उसे ढूंढता है. एक दिन जब वो अपने मित्र आकाश के यहाँ जाता है तो उसे पता चलता है कि वो स्त्री उसके दोस्त की माँ है.

दीपक तिजोरी ने  अपनी फिल्म के माध्यम से स्त्री को कैद से मुक्ति दिलाने का काम किया. इस फिल्म में भारतीय समाज में स्थापित मूल्यों को डीकांस्त्रक्ट (deconstruct) करने का काम किया है.  हलाकि यह फिल्म भारतीय संस्कृति और मूल्यों के विरुद्ध जाकर एक ऐसे समाज और स्त्री की कहानी बताता है जो हमारे यहाँ कभी कभार ही दिखाई देती है. इस फिल्म को हम समाज की एक घटना के रूप में तो देख सकते है पर ये नहीं कह सकते की ये सामाजिक चलन का एक हिस्सा है. इस फिल्म की मुख्य किरदार एक ऐसी स्त्री है और वो एक ऐसे समाज से है जो सामान्य भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व नहीं करती. बेटे के सामने जब ये राज खुलता है की उसकी माँ कम उम्र के लड़को के साथ सम्बन्ध बनाती है और उसका अपना दोस्त उसकी माँ के साथ सोता है. फिल्म में निर्देशक ने बड़े ही सरल भाव और कम समय में इस घटना को प्रदर्शित किया है. बेटा माँ के सामने जब प्रश्न रखता है तो माँ के उत्तर के सामने वो असहाय दिखाई पड़ता है. पर क्या पति और बेटा समय न दे और लोग दूर –दूर हो जाये तो भारतीय समाज स्त्री को इतनी स्वतंत्रता देता है की वो दुसरो के साथ सम्बन्ध बना कर अपनी शारीरिक और मानसिक शांति प्राप्त करे. क्या ऊप्स फिल्म की महिला सामान्य भारतीय औरत है और इस समाज में फिट बैठती है. कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका जवाब न तो फिल्म देती है और न ही निर्देशक ऐसे सवालों के लिए तैयार दिखाई देता है.Image result for oops film in hindi

स्त्री की शारीरिक इच्छाओं को उम्र के दायरे में कैद करने का काम सिनेमा सौ साल से बखूबी करता आया है. शारीरिक आधार पर स्त्री और पुरुष संबंधो के चित्रण में इस तरह का उदाहरण मिलना बहुत मुश्किल है. संस्कृति के नाम पर स्त्री को कैद कर के रखने का काम सिनेमा बखूबी निभाता चला आ रहा है. गाहे बगाहे किसी की दया दृष्टि स्त्री पर पड़ती थी और वो उसे सहारा देने का प्रयास करता रहा. पर ज्यादातर लोगों ने स्त्री पात्र के साथ न्याय नहीं किया. ऊप्स फिल्म की स्त्री एक प्रौढ़ महिला है और समाज के नियमो को तोड़ती दिखाई देती है. ऐसी पार्टी जहा पुरुष उपभोग की वस्तु है और महिलाएं वो काम करती दिखाई दे जिसके लिए वो नहीं जानी जाती है तो थोडा अचम्भा होता है. यही ऊप्स फिल्म का हाल है. कहानी दमदार है पर निर्देशेक का ज्यादा ध्यान सेक्स और फिजिकल रिलेसन पर ही अटका हुआ है. स्त्री की मुक्ति के  मायने सिर्फ सेक्स नहीं हो सकता. हालाकि ऊप्स की स्त्री अपराधबोध से ग्रस्त नहीं है  जो इस फिल्म की खासियत है पर अंत में अपने आप को दोषी मानना और हार्ट फेल का सीन उसके चरित्र को कमजोर बना देता है. बेटे और बाप को अपनी गलती का इतनी जल्दी एहसास और स्त्री को अंत में क्षमा कर अपना लेना फिर से पुरषप्रधानता को स्थापित करता है. पिता, पुत्र और पत्नी के  बीच के अंतरद्वंद को दिखाने में थोड़ी जल्दीबाजी की गयी  है और फिल्म अपने स्त्री किरदार को गौड़ बना देती है.