प्रेस की आंतरिक स्वतंत्रता बनाम बाहरी हस्तक्षेप

प्रेस की आंतरिक स्वतंत्रता बनाम बाहरी हस्तक्षेप

प्रो0 गोविंद जी पांडेय

विभागाध्यक्ष, जनसंचार एंव पत्रकारिता विभाग, बीबीएयू, लखनऊ

’प्रेस की स्वतंत्रता को सिर्फ बाहरी हस्तक्षेप से नही बचाना है बल्कि इसे आंतरिक हस्तक्षेप से भी बचाने की उतनी ही जरूरत है।’ (पत्रकारों के लिए दिशानिर्देश, 2010 का संस्करण जारी करते समय भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस जीएन रे )1

मीडिया संस्थानो से प्रशिक्षण हासिल कर निकला हुआ युवा जब पत्रकारिता के आफिस में पहुचता है तो उसका जोश देखते बनता है। बड़े लोगो से मिलना और अपनी खबर से पहचान बनाने की आशा उसे हाड़-तोड़ मेहनत के लिए और पत्रकारिता के आड आवर में काम करने के लिए प्रेरित करती है। शुरूआती कुछ दिन और महीने उत्साहपूर्वक काम करते हुए उसे इस बात का अभास हो जाता हैं कि जो बाहर से दिखता है वो अंदर नही है।

जैसे ही पत्रकार किसी राजनेता, कारपोरेट या समाज में स्थापित उच्च पदेन लोगों के बारे में कुछ खबर लाता है वैसे ही उसे मीडिया के आंतरिक लोकतंत्र के गला घुंटे होने का अहसास हो जाता है। खबर का असर परखा जाता है और अगर बिक्री लायक हुई तो उसे बेच दिया जाता है। इस क्रम में पत्रकारिता के माध्यम से समाज को दिशा दिखाने का सपना लिए हुए उस प्रशिक्षु पत्रकार का हृदय तार-तार हो जाता है।

आज पत्रकारों, राजनीतिज्ञां और कारपोरेट घरानो के गठजोड़ को बताने की जरूरत नही है। राडिया कांड के बाद से इनके बीच की खिचड़ी को सभी ने भर-पेट खाया है। कुछ वक्त तक मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाला यह प्रकरण अब एकेडेमिक चर्चा का विषय मात्र बन कर रह गया है।

मीडिया में छप रही खबरो  में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमेंशा सुर्खियां बटोरता रहा है। पत्रकारों के बीच हमेशा अपनी खबरो के कारण होने वाले नुकसान की चर्चा चलती रहती है। दिन भर समाचारों को पाने की होड़ और अगर कुछ खास मिल गया तो छपने का सुकून इससे हर पत्रकार रोज रूबरू होता है। पर आजकल एक खास डर पत्रकारों के दिल का सुकून छीन रहा है। हर रोज खबरो की जंग और उसके बाद सरकार और न्यायपालिका के  द्वारा  बढ़ते अपराधिक मानहानि के किस्सो ने पत्रकारों का चैन छीन लिया है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिपाही की कलम की धार को कुंद करने का काम बड़े ही चुपके और कानूनी दाव-पेंच से किया जा रहा है। जनता को सच्चाई से अवगत कराने में ज्यादातर ऐसे लोगों के खिलाफ खबरें लिखनी पड़ती है जो महत्वपूर्ण ओहदों पर बैठें है या अपराधी प्रवृत्ति के है। अगर कोई अपराधी किसी खबर के कारण पत्रकार से नाराज है तो पत्रकार के पास तमाम कानूनी रास्ते है जो बचाते है। पर समस्या तब आती है जब चुनी हुई सरकार ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने पर आमादा हो जाए।

हाल के दिनो में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले है जिसमे सच की आवाज सरकार ही दबाने पर आमादा थी। मीडिया पर हमलों को लगातार निगरानी करने वाली संस्था ‘ द हूट’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सन 2010 से मीडिया पर हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हालिया में जगेंद्र सिंह की मौत ने हालात को और बदतर बनाने का काम किया है। सोशल मीडिया पर अपनी लेखनी के द्वारा जाना जाने वाला जगेन्द्र को शायद सपने में भी ये खयाल नही आया होगा कि वो एक दिन उसकी रक्षा करने के लिए बनायी गयी पुलिस और उसके मत से सत्ता में आयी सरकार के नुमाइंदे ही उसके जीवन को लील जाएगें। दुर्भाग्य तो ये कि उसके पत्रकार होने और न होन पर बहस चल रही थी। जिंदा जलने का दर्द भी शायद जगेंद्र को न सालता अगर कुछ सत्ता के दलालो और तथाकथित कुछ बुद्धिजीवी पत्रकारो का रवैया उसके प्रति इतना हिकारत भरा न होता।

जगेंद्र का केस इकलौता नही है जिससे चिंता बढ़ती है। आंध्र प्रदेश में दैनिक आंध्र प्रभा में काम करने वाले पत्रकार, शंकर की सन 2014 मे घर लौटते समय पीट-पीट कर की गयी हत्या यह दर्शाता है कि भारत का कोई भी भूभाग इन हत्यारो से छूटा नही है। उनका गुनाह सिर्फ यही था कि तेल माफिया और चावल के मिलों में धांधली के बारे में अपने अखबार में निरंतर लिखते रहे थे। आज उनका परिवार आतंक के साये मे रह रहा है और ये घटना अन्य पत्रकारो को डराने के लिए काफी हैं।

ऐसा नही है कि सिर्फ प्रिंट मीडिया के पत्रकारो पर ही हमले हो रहे है, इससे कोई भी अछूता नही है। मुजफ्फर नगर के दंगो के दौरान आई बी एन 7 के पत्रकार राजेश गुप्ता दंगाइयों का शिकार बन जाते है। प्रशासन इस बात की तसदीक ही करते रह जाता है कि उनको मारा किसने है। प्रशासन का यह रवैया भारत में अंग्रेजी शासन की भयावहता की याद दिला जाता है। पुलिस नाम की संस्था का ऐसा दुरूपयोग, यह कल्पना शायद इस संस्था के बनाने वालो ने भी कभी नही की होगी।

दुख तो इस बात का है कि लोगो को सच्चाई से रूबरू कराने वाला पत्रकार जब खुद मुसीबत में होता है तो न तो जनता और न ही उनका संगठन उनकी मदद को आता है। आज जगेंद्र और शंकर की आत्मा उनके गुनाहगारों को सजा दिलवाने के लिए तड़प रही होगी। पर दुर्भाग्य यह है कि हर छोटी बड़ी बातों पर आंदोलन करने वाले राजनीतिक दल या सिविल सोसाइटी के लोग आज इन पत्रकारों के हत्यारों को सजा दिलवाने के लिए छोटी पहल भी नही करने को तैयार है।

अपने हाल पर छोड़ दिया गया पत्रकार जो कभी मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू होत देखने का ख्वाब देखता है तो कभी अपने मालिको की चालाकिंयो को दिल में लिए हुए देश बदलने का सपना संजोए है। आज पत्रकार की हालत उस दीपक की तरह हो गयी है जिसमे न तो तेल है और न ही तूफानों से लड़ने के हथियार। पर हर ओर से एक आशा भरी निगाह है जो उसे खाली पेट लड़ने का मलाल नही होने देता।