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मेरी तीन कहानियां - बॉम्बे से गोआ तृतीय अध्याय-

मेरी तीन कहानियां - बॉम्बे से गोआ तृतीय अध्याय-


अपने मित्र सनोज को किसी तरह समझा के जब हम मुम्बई दर्शन के लिये निकले तो एकाएक उन्हे डांस देखने की सुझी। बनारस से मायनगरी की यात्रा मे अब माया का दर्शन होने लगा। मैने उन्हे बडा समझाया की ये हम जैसे लोगो के लिये नही है पर वो थे की मान ही नही रहे थे। अब मरता क्या न करता दोस्ती का धर्म निभाने का वक्त था। दोस्त के लिये कुछ समय के लिये बनारसी संस्कारो को ताक पर रख डांस बार मे घुस लिये। हम सब अब डांस बालओ के बारे मे बहुत कुछ पढ और सुन चुके है पर मेरा अनुभव मेरे संस्कारो को और मजबूत बना गया। बनारस मे रह कर भी पान, तम्बाखू या भंग का सामना न हुआ हो ऐसा हो नही सकता।पर हम थे की जेब मे पैसे रखकर भी ये शौक न पाल पाये।
मुम्बई के बाहर डांस बार को बड़ी गंदी निगाह से देखा जाता है। और क्यो न हो पहली नजर मे जब अन्दर जाने के लिये हम काउंटर पर पहुचे तो 91 में 300 पर हेड का झटका लगा। हाथ पर मोहर लगा कर कैदियो की तरह प्रवेश किया।
अंदर धुप अन्धेरा। हाथ को हाथ नही दिख रहा था। पर जैसे-जैसे आंखो ने अन्धेरे मे देखने की क्षमता पायी दिल पर गिल्ट का बोझ बढता जा रहा था। शहर के संस्कार हमे बैठने नही दे रहे थे और मित्र का साथ हमे उठने नही दे रहा था।
सनोज तो जैसे जन्नत मे पहुच गये। एक साथ बियर, वाइन, सभी का दो-दो पैग। दो मेरे सामने दो उनके । मैने कहा दो क्यों। मैं तो पियुन्गा नही। उन्होने बड़ी मासूमियत से कहा यार लोगो को ये न लगे की सिर्फ्ं मै ही पी रहा हू। इसिलिए तुम्हारे लिये भी मंगा ली।मैने धीरे से वेटर को बुलाया और एक काला ड्रिंक लाने लाने के लिये बोला। उस का चेहरा देख लग् रहा था कि मैने क्या मांग लिया ।
खैर अन्धेरा बढता गया और मेरी बैचनी भी। डांस बार अपने पूरे शवाब पर था। हम बनारस के दो 19-20 साल के युवा उस दृश्य को देख हैरांन हो रहे थे। लोग जेब से इतने पैसे निकाल कर हवा मे लहरा रहे थे जितना हमने अपने जीवन मे न देखा हो।
मेरी नजर डांस फ्लोर पर नाच रही एक डांसर पर थी जिसकी भाव भंगिमा से मुझे वो बहुत बैचन दिखाई दे रही थी। बार मे ज्यादातर लोगो ने इतनी पी रखी थी कि वो खुद को भी पहचानने से मना कर देते तो दूसरो की परेशानी से उन्हे क्या फर्क पड्ता।
एकाएक कही दूर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आयी। डांस फ्लोर पर उस डांसर का बैचैन चेहरा अब परेशान दिखाई पड़ रहा था। डांस और फ्लोर की लाईट की गर्मी मे भीगी वो एकाएक तेजी से एकतरफ दौड्ती है। पूरे बार मे शायद एकमात्र होश मे मै ही था। उसका भागना मुझे खटक गया। मै सारे खतरो को नजरं अंदाज करते हुए उसके पीछे सावधानी से आगे बढा। गार्ड ने रोका तो उसे छोटी उंगली दिखाते हुए आगे बढा।
अन्दर अंधरे का साम्राज्य था। पर एक कमरे मे उजाला दिख रहा था। जैसे ही मै आगे बढा मेरे कदम उस दृश्य को देख कर जड़ हो गये। डांस फ्लोर पर बैचनी का कारण दिखाई पड़। एक अबोध बच्चा जो अपनी मा के लिये रो रहा था वो उसके सीने से लिपटा अपनी भूख मिटा रहा था।
आज तो हद हो गयी । ज्ञान की पराकाष्ठा । एक तरफ शरीर के भूखे लोग दुसरी ओर जिन्दा रहने की लडाई। मेरी निगाहो मे उस बार बाला का कद मेरे भगवान सा हो गया। मा क्या होती है और अपने बच्चे के लिये क्या कर सकती है उसका चरम उस दिन दिखा।
आज जब लोग बार डांसर को लेकर उटपटांग बाते करते है तो मुझे वो मा याद आ जाती है। 28 साल बीत गये और आज भी वो घटना मेरे दिल मे जिन्दा है।आज हर उस मा को सलाम जो अपने टुकडे को जिन्दा रखने के लिये अपने जिस्म के टुकडे भी बर्दाश्त कर लेती है।
कई बार ज्ञान पाठशाला मे ही नही मिलता।उसके लिये यायावरी दरकार है। सनोज सारे पैग लगाकर ज्ञान दे रहे थे और मैं मित्र धर्म से बंधा उन्हे सुरक्षित होटल वापस ले जाने का जुगाड कर रहा था।

इस यायावरी के ज्ञान से निकला सच क्या सभ्य समाज को सोचने पर मजबूर करेगा।
कल फिर मिलेंगे यात्रा के चौथे अध्याय मे
शुभ रात्रि।

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