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उद्योगो के भेट चढ़ता हस्त शिल्प

उद्योगो के भेट चढ़ता हस्त शिल्प

अरुण कुमार

भारत की संस्कृति और विरासत में हस्त शिल्प का अपना महत्व ऐतिहासिक काल से रहा है , अगर हम एक नजर अपने देश के प्राचीन एव मध्यकालीन समाज पर नजर डाले तो हमें उस समय एक ऐसा गांव या क्षेत्र देखने को मिलते है जो अपने आप में एक देश की तरह दिखते थे, जहाँ हर व्यक्ति को अपनी जरूरतों के सामान अपने ही गांव में मिल जाते थे, चाहे वो दर्जी हो या लुहार , बढ़ई ,माली या इसी प्रकार अन्य समुदाय जिनकी आजीविका का प्रमुख साधन उनकी हस्त शिल्प है , समय के साथ परिवर्तन हुआ इनमे कुछ ऐसे शिल्पी ऐसे थे जो इस भौतिकता वादी विकास की दौर में खुद का अस्तित्व बनाये रखने में कामयाब रहे क्योंकि ये ऐसे शिल्प थे जो सीधे व्यक्ति की रोज की जरूरतों के सामानो का निर्माण करते थे, परन्तु इन्ही शिल्पियों में कुछ ऐसे भी है जो आदिवासी शिल्प कार्य में जुटे थे जिनका काम पत्तल बनाना जूट और कपास से रेसो का निर्माण करना | इस प्रकार के शिल्प में उद्द्योगों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा जिसके कारण इस शिल्प से लगे लोग इनसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके और आज भी अपने दो पल की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे है |

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