पत्रकारों पर उठने वाले हाथ लोकतंत्र का गला घोटने जैसा है


पत्रकारों पर उठने वाले हाथ लोकतंत्र का गला घोटने जैसा है | अपनी जान जोखिम में डाल कर सभी देशवासियों को सच से रूबरू कराने का काम करने वालो पर आज कल जनता से लेकर नेता और अब तो अफसर भी हाथ सेकने से गुरेज नहीं कर रहे है | पर कारण क्या है ? इसकी अगर पड़ताल की जाए तो कहीं न कही पत्रकारिता और उसके चलाने वाले लोग भी जिम्मेदार दिखाई देते है |

आज पत्रकारों को इतने हल्के में लेने का कारण प्रशासनिक संवेदना और जनता का साथ न होना है | जनता ने जिस तरह से वकालत का तिरस्कार किया उसी तरह पत्रकार भी अब जनता से दूर हो गया | जनता ने अब इसे अपने हित का रखवाला न समझ किसी न किसी जाति , धर्म , संप्रदाय और पार्टी का प्रतिनिधि मान लिया है|

शायद कुछ हद तक ये सच हो पर अभी भी बहुत सारे सच्चे पत्रकार है जिन्होंने पत्रकारिता की मशाल को बुझने नही दिया है | पत्रकारों को अगर अपने उपर हमले रोकने है तो अपने मृत पड़े पत्रकार संघो जिसपर कुछ लोगो का कब्ज़ा हो जाता है उसको जीवित करना होगा | किसी भी पत्रकार की लड़ाई लड़नी होगी इसमें संस्था आड़े नहीं आना चाहिए -

ये बड़ा पत्रकार है तो उसकी लड़ाई सब लड़ेंगे पर अगर छोटा है तो अपने बीच ही उसको छोटा मानकर उसकी लड़ाई को अनदेखा कर देंगे - कलयुग में संगठन में ही शक्ति का वास होता है | पत्रकार संगठन इतना कमजोर और बटा हुआ भारत विभाजन के समय भी नहीं होगा |

पर दुर्भाग्य कुछ लोग जो शासन और सत्ता के करीब है और मान्यता प्राप्त को ही पत्रकार मानते है उससे ये संगठन कभी मजबूत नही होगा | छोटा या बड़ा , मान्यता प्राप्त या बिना मान्यता का कोई भी व्यक्ति जो पत्रकारिता में लगा है उसका संघर्ष अगर पत्रकार बिरादरी का संघर्ष नही होगा तो ऐसे ही सडक पर पिटते रहेंगे और लोग मजा लेंगे |

पत्रकार बनाम डॉक्टर

पहले डॉक्टर को भी लोग इसी तरह पिटा करते थे पर उन्होंने संगठित हो कर कानून पास करवा लिया | अब डॉक्टर या फिर उनके क्लिनिक पर तोड़फोड़ करना सगीन अपराध माना जाता है जिसमे जेल और जुरमाना दोनों भरना पद सकता है |

वकील और पत्रकार : वकील भी संगठित होते है और उन पर हाथ उठाना इतना आसन नही है - पुरे देश के वकील हड़ताल पर होते है या फिर अपने संगठन की शक्ति के दम पर शासन से अपने उपर हमला करने वालो के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करवा लेते है |

इसमें सबसे कमजोर संगठन पत्रकारों का है जो अपने लोगो को पिटता देखता है और कुछ नही कर पाता - उसका सबसे बड़ा कारण पत्रकारिता संघो का बट जाना है | वो बटे हुए है और कई बार अपनों के खिलाफ ही पैताराबजी करते है - हर वो संगठन कमजोर होता है जहाँ के लोग इक दुसरे को छोटा -बड़ा मानते है |


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