बालश्रम : आखिर कब तक बारातों में लाइट, ट्राली खींचते नाबालिक बच्चे ?

आखिर कब तक बारातों में लाइट खींचने और अपने बचपन का बैंड बजाता रहेगा…छोटू

सस्ती और मन मुतााबिक मजदूरी देकर हर रोज नाबालिक बच्चों का शोषण कर कमा रहे लाखों

आगरा : भले ही देश को आजाद हुए 72 वर्ष हो गए हों, लेकिन आज भी दलित, और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को अपना पेट मेहनत मजदूरी करके ही पालना पड़ रहा है। हांलाकि श्रम विभाग द्वारा फाइल की प्रक्रिया को पूरी करने के बाद स्थिति जस की तस ही रहती है।

बाल अधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस ने नाबालिग बाल मजदूरों के अंधकार में जा रहे भविष्य को रोकने के लिए जिलाधिकारी और श्रम विभाग को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है।

आमतौर हम लोग छोटू का सम्बोधन सुनते ही जहन में एक बाल मजदूर ही छवि आ जाती है। स्थिति कल भी वही थी और आज भी वही है, कहीं जो नहीं हुआ है वह बदलाव है। लगभग 22 लाख की आबादी वाले शहर में लगभग पांच हजार के आसपास बाल मजदूर हैं।

इनमें से कुछ ही रात के समय बारातों में बैंड-बाजों के बीच या फिर मैरिज होम्स में देखे जा सकते हैं। शहर के गली मौहल्लों में चलने वाले कारखानों, चाय की दुकानों और ढाबों पर देखे जा सकते हैं।

बाल मजदूरों का प्रयोग सबसे अधिक शादियों में कार्टून की पोशाक पहन कर मनोरंजन करने वालों बारातों में छोटे बच्चों से बैंड बजवाए जाते हैं और उनसे भारी सामान (लाइट, झाड़ आदि) उठावाए जाते हैं। बैंड संचालकों-वादकों द्वारा बच्चों से देर रात तक बैंड बजवाए जाते हैं।

बाल मजदूरों का बचपन का सौदा भी बेहद कम मजदूरी देकर किया जाता है। बारातों में बालश्रम रोकने के लिए बाल अधिकार कार्यकर्ता एवं महफूज संस्था के समन्वयक नरेश पारस ने जिलाधिकारी और श्रम विभाग को पत्र लिखा है।

बारातों लाइट झाड़ उठाने वाले या ट्राली खींचने वाले अधिकांश बच्चों की उम्र 14 वर्ष से कम होती है। उनसे भारी सामान उठवाए जाते हैं तथा मैरिज होम में बच्चों को दरबान बनाकर खड़ा किया जाता है। यह बाल श्रम की श्रेणी में आता है। बाल श्रम प्रतिषेध अधिनियम के तहत 20-50 हजार रुपये तक जुमार्ना और छह माह से लेकर तीन साल तक कैद का प्रावधान है।

Tags:    Child Labour 
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