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लविवि में होगी वैवाहिक मामलों के निपटारे में न्यायालय के अतिरिक्त उपायों की तलाश एवं पुुुत्रियों के कृषि भूमि में उसके अधिकारों की समीक्षा....

लविवि में होगी वैवाहिक मामलों के निपटारे में न्यायालय के अतिरिक्त उपायों की तलाश एवं पुुुत्रियों के कृषि भूमि में उसके अधिकारों की समीक्षा....


लखनऊ विश्वविद्यालय ने उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दो प्रोजेक्ट स्वीकृत किये है। एक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत 'सेंटर आॅफ एक्सीलेंस' की स्थापना हेत 3 लाख की धनराशि स्वीकृत की है। इस योजना के अन्तर्गत विश्वविद्यालय के चयनित विभागों को सेंटर आॅफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया जाता है जिससे वह विभाग अपने उत्कृष्टतम रूप से विकसित होकर कार्य कर सके।

इसी के अन्तर्गत विभाग वैवाहिक मामलों को कोर्ट में निपटाने के अलावा अतिरिक्त विकल्पों पर विचार कर शासन को इस संबंध में अपनी रिर्पोट सौंपेगा। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए विभाग के प्रोफेसर और इस योजना के प्रधान अन्वेषक पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार सिंह ने कहा कि सामान्य न्यायालयों द्वारा वैवाहिक विवादों में मामलों के पक्षकारों को हो रही असहनीय पीड़ा एवं ऐसे मामलों में अत्यधिक बढ़ोतरी के कारण इसका अतिरिक्त बोझ न्यायालयों पर पड़ रहा है, और विवाह-विच्छेद के ज्यादातर मामलों के निपटारे में सालों लग रहे है। जबकि वैवाहिक पक्षकारों को कोर्ट का सामना करने की नौबत ही न आए इसके लिए ही इसके अतिरिक्त विकल्पों पर शोध करने के लिए विभाग को सेंटर आॅॅफ एक्सीलेंस दिया गया है।

वहीं दूसरे प्रोजेक्ट 'रिसर्च एवं डेवलपमेंट' योजना के अन्तर्गत ढाई लाख की धनराशि स्वीकृत की गई है। इस योजना के अन्तर्गत शिक्षकों को विशिष्ट क्षेत्रों में उत्कृष्ट शोध हेतु धनराशि स्वीकृत की जाती है।

इसी के अन्तर्गत यह प्रोजेक्ट भी प्रो. राकेश कुमार सिंह को दिया गया है इसके साथ ही प्रो.राकेश कुमार सिंह को उत्तर प्रदेश में 'मिशन शक्ति' के अन्तर्गत पुत्रियों की कृषि सम्पत्ति एवं सहदायिक सम्पत्ति में उत्तराधिकार की स्थिति का लखनऊ जनपद के बक्शी का तालाब तहसील (ब्लाक) के संबंध में एक विधिक मूल्यांकन के शोधकार्य हेतु दिया गया है।

हिन्दू विधि और अन्य व्यक्तिगत कानूनों में विवाह को एक पुनित कार्य माना गया है, और इसे अनिवार्य बनाया गया है। दुनिया के किसी भी देश में इस तरह की विधि देखने को नहीं मिलती है जिसमें विवाह करने पर स्त्री को उत्तराधिकार से वंचित करने का प्रावधान है जबकि अविवाहिता की स्थिति में उसे हक मिलता है, अर्थात यदि पुत्री को भूमि विधि में अधिकार चाहिये तो उसे विवाह से वंचित होना पड़ेगा, उसे विवाह या भूमि में एक को चुनना होगा।

इससे बड़ी विड़म्बना एक स्त्री के लिए क्या हो सकती है! जैसे कि उत्तर प्रदेश राजस्व सहिता, 2006 के अन्तर्गत उत्तराधिकार विधि में स्पष्ट प्रावधान है कि ऐसी पुत्री, जिसने अविवाहित होने के कारण अपने पिता की कृषि सम्पत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त की है, विवाह होने पर अपनी इस कृषि सम्पत्ति में अपना अधिकार खो देती है। ऐसी ही विधियों एवं उसके पड़ने वालों प्रभावों की समीक्षा इस प्रोजेक्ट के अन्तर्गत की जायेगी।

अराधना मौर्या

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