संवाद लेखन को और धार दे, बॉलीवुड में अपनी जगह बनायें!

संवाद लेखन को और धार दे, बॉलीवुड में अपनी जगह बनायें!

साभार :  सोशल मीडिया 

पढ़ते रहिये संवाद सीरीज बचपन एक्सप्रेस पर : प्रो गोविन्द जी पांडेय

संवाद ने मनुष्य का इतिहास बदल उसे पशु से ऊपर उठा कर बौद्धिक जगत का सिरमौर बना दिया | मनुष्य और पशु में विभेद का मूल यही है कि हम संवाद के माध्यम से अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करते है | ऐसा नहीं है की पशु संवाद नहीं करते पर वो अपने संवाद को संरक्षित नहीं रख पाते और यही पर वो मनुष्य से मात खा जाते है |

मनुष्य में संवाद के सृजन का इतिहास पुराना है | जब व्यक्ति और पर्यावरण एक थे तो मनुष्य भी उसी पर्यावरण का हिस्सा बन पशु की भाति रहता था | पर आग की खोज और गुफाओं में रहने के दौरान जब मनुष्य को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का समय मिला तो ज्ञान -विज्ञानं की एक धारा निकल पड़ी और मनुष्य अपने विकास के रास्ते पर निकल पड़ा |

सर्वप्रथम गुफा में चित्रों को उन दीवारों पर पत्थरो और नुकीले हथियारों से उकेर कर मनुष्य अपनी भावना की अभिव्यक्ति करने लगा | उन चित्रों में उनके अनुभव शामिल थे जहां आग का चित्र तो खतरनाक जानवरो का भी चित्र मिलता है | मनुष्य जब अपने इर्द -गिर्द के वातावरण से निकला होगा तो उसे उन यादों को सहेजने के लिए इन चित्रों का सहारा लेना पड़ा |

संवाद धीरे -धीरे ध्वनि की सहायता से होने लगा और उन्ही ध्वनियों से शब्दों की उत्पत्ति हुई और विचार को सहेजना मनुष्य को आ गया | एक ही शब्द का प्रयोग और शब्दों को इधर -उधर , कई क्रम में रख अर्थ निर्माण की प्रक्रिया जो शुरू हुई वो अब सूचना और विचार के महासमुन्द्र का रूप ले चुकी है |

संवाद के मौखिक और लिखित साक्ष्य मिलते है , भारतीय परम्परा श्रुति आधारित थी इसलिए हमारे ज्ञान का आधार संवाद ही है | एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान संवाद के माध्यम से न सिर्फ आगे तक ले जाया गया बल्कि संरक्षति भी हुआ |

पर श्रुति के साथ जो सबसे बड़ी समस्या थी वो व्यक्ति केंद्रित होना थी | अगर व्यक्ति अच्छा है , ज्ञानी है तो वो उस परंपरा को सही तरीके तक दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाता था पर लिखा न होने के कारण ज्ञान के निरन्तरता में कही न कही परेशानी थी | इस परेशानी से बचने के लिए लिपि का निर्माण हुआ और अब ज्ञान संरक्षति होने लगा और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से सूचना को पहुंचाया जाने लगा |

क्रमशः

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