प्रेम भारतीय संविधान का सार: माननीय कुलपति प्रो. संजय सिंह

प्रेम भारतीय संविधान का सार: माननीय कुलपति प्रो. संजय सिंह


प्राचीन भारतीय गौरवशाली ज्ञान परंपरा के ध्वजवाहक, विज्ञानं और संस्कृति पर सामान प्रभुत्व रखने वाले हम सबके प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक विद्वान माननीय कुलपति प्रो. संजय सिंह जी ने आज संविधान दिवस के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि भारत के संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रेम है। प्रेम ही वह दर्शन है जिसके आधार पर संविधान की रचना की गयी थी।

ढाई अक्षर का यह शब्द जो हमें प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और बंधुत्व की प्रेरणा देता है यह न केवल भारत की महान परम्परा का सार है बल्कि यह संविधान की उद्देशिका से लेकर उसके विभिन्न उपबंधों में परिलक्षित होता है। आज प्रेम के अत्यंत गूण दर्शन की जिस तरह उन्होंने सरल व्याख्या की और बताया की समाज की हर एक समस्या का समाधान ढाई अक्षर के इस शब्द में समाहित है तो यह विचार उसी भारतीय दर्शन को रेखांकित करता है जिसमे प्रेम ही ईश्वर है और प्रेम ही प्रकृति है।

प्रेम हमें निश्वार्थ बनता है और प्रेम ही हमें दूसरो की पीड़ा को समझने योग्य बनाता है। वह समाज जो प्रेम और स्नेह के मूल्यों का सम्मान करता है वहा न कोई शोषण है न कोई असमानता है। प्रो सिंह ने कहा कि आज आवश्यकता समाज को जोड़ने की है और यह केवल प्रेम से ही संभव है।

भारत की महान ज्ञान परम्परा जो विश्व बधुंत्व पर आधारित है उसमे घृणा और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। हमारे देश की संस्कृति तो वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित है जिसमे केवल प्रेम और बंधुत्व के आधार पर सम्पूर्ण पृत्वी या जगत को ही एक परिवार के रूप में संकल्पना की गयी है।

माननीय कुलपति जी ने संविधान शिल्पी डा. आंबेडकर के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि जिस तरह बाबासाहेब का नाम पूरे देश में चमकता है उसी तरह उनके ही नाम पर स्थापित यह विश्वविद्यालय हम सबके सामूहिक प्रयास से देश के फलक पर चमकने का निरंतर प्रयास कर रहा है और यह संभव हुआ है केवल आपसी प्रेम के कारण जो हम सबको एक परिवार के रूप में जोड़े रखता है। यह प्रेम की भावना ही है जो हम सब एक दुसरे के साथ सबको साथ लेकर आगे बढ़ रहें हैं.

यह प्रथम अवसर नहीं है जब कुलपति प्रो. सिंह ने भारतीय ज्ञान, दर्शन और मूल्यों को अपने उद्भोधन में स्थान दिया यही। इसके पहले भी अनेक अवसरों पर अपने उद्भोदन में प्रो. सिंह ने भारतीय दर्शन को पश्चिम सभ्यता और ज्ञान से जोड़ते हुए अपने देश की महान संस्कृति के योगदान की चर्चा की है और वैज्ञानिकों और अध्यापकों से आग्रह किया है की वह विज्ञानं और शोध को केवल प्रयोगशाला या कक्षा तक सीमित न रखे बल्कि इसको समाज के बीच लेकर जाएँ जिससे शोध का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति को मिले।

माननीय कुलपति जी जो स्वयं एक वैज्ञानिक हैं और जिनकी गिनती विश्व के चुनिंदा श्रेष्ठ वैज्ञानिकों में होती है वह हर अवसर पर विज्ञानं को समाज से जोड़ने और उसका लाभ समाज के हर एक व्यक्ति तक पहुंचाने का न केवल स्वयं प्रयास करते हैं बल्कि अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं।

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