हिंदी भाषा में अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने की क्षमताः डाॅ0 जनार्दन उपाध्याय

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हिंदी भाषा में अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने की क्षमताः डाॅ0 जनार्दन उपाध्याय


अयोध्या। डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के हिंदी भाषा एवं प्रयोजनमूलक विभाग तथा क्षेत्रीय भाषा केंद्र में बैंक ऑफ बड़ौदा के सौजन्य से विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर ‘‘वैश्विक पटल पर हिंदी के बढ़ते कदम‘‘ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य वक्ता का. सू. साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय के सेवानिवृत्त आचार्य डॉ0 जनार्दन उपाध्याय ने हिंदी भाषा के वैश्विक स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा की हिंदी भाषा में अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने की क्षमता है। किंतु क्षेत्रीय भाषाई लड़ाइयों ने इसमें अवरोध उत्पन्न कर रखा है। इसीलिए विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक होने के बाद भी विश्व भाषा की विधिक श्रेणी में आने का संघर्ष जारी है। कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि हमें यह समझने की आवश्यकता है कि अहिंदी भाषी होने का अर्थ हिंदी विरोधी होना नहीं है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत की भावनात्मक दूरी का परिणाम है भाषाई दूरी। यह सामाजिक विखंडन का भी बड़ा कारण है। भावों को सीमित करके असीमित विकास की संभावनाएं नहीं बनती हैं।

कार्यक्रम में डाॅ0 उपाध्याय ने चंद्रशेखर, इंदिरा गांधी, नरसिम्हा राव ,अटल बिहारी वाजपेई जैसे अनेक नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि देश का प्रतिनिधित्व करते हुए इन नेताओं ने भाषा का प्रतिनिधित्व भी किया है और हिंदी को वैश्विक बनाने में बड़ा योगदान दिया है भारतीयों में भाषाई गर्व बढ़ाने की उपलब्धि भी हासिल की है जिससे विदेशी संपर्क और साहित्यिक सांस्कृतिक रुचि उत्पन्न हुई है और अनुवाद के माध्यम खोले हैं। इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को पढ़ने समझने की रुचि बढ़ाई है। अत्यंत सरल और वैज्ञानिक भाषा होने के कारण इसे सीखना और बोलना आसान है। इसे अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में भी स्थापित किया जा सकता है क्योंकि यह विश्व की भाषाओं के मध्य आत्मिक संबंधों को दृढ़ करने का माध्यम और समरसता स्थापित करने का माध्यम भी हो सकती है। उन्होंने फिल्म ,पत्रकारिता ,तकनीकी और प्रवासियों के योगदान को भी सराहा है। कहा है कि विश्व में हिंदी को स्थापित करने में फिल्म जगत का विशेष योगदान है उन्होंने कहा अन्य विदेशी भाषाओं में बनने वाली फिल्में आज हिंदी में अनूदित होकर भारत के बाजार को प्रभावित कर रही हैं जिसमें भारतीय दर्शकों और हिंदी भाषी नागरिकों को लुभाने की क्षमता है, जो पूरे विश्व में फैले हुए हैं। भारत विश्व में अपार संभावनाओं से भरा है, जो हिंदी भाषियों से पटा पड़ा है। किंतु फिर भी क्षेत्रीय भाषाओं की आड़ में षड्यंत्र रचकर हिंदी को वैश्विक होने नहीं दिया गया। विश्व भाषा की विधिक श्रेणी में आने के लिए हमें इन बाधाओ से पार पाना ही होगा।

कार्यक्रम का संचालन डॉ0 प्रत्याशा मिश्रा ने किया। अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 सुमन लाल ने किया। इस अवसर पर विभाग के समन्वयक डाॅ0 सुरेन्द्र मिश्र, बीए समन्वयक डॉ0 डी .एन वर्मा, डाॅ0 स्वाति डॉ0 प्रतिभा देवी, डॉ0 दिव्या वर्मा सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रही।

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