Top

"151 वीं जयंती पर गांधी जी के रामराज्य की कल्पना" पढ़े डॉ. प्रविता के विचार

151 वीं जयंती पर गांधी जी के रामराज्य की कल्पना     पढ़े डॉ. प्रविता के विचार


Dr.pravita Tripathi

महापुरुषों के वचन सदियों से चर्चा और चिंतन का विषय रहे है मेरा मानना है कि जीवन का निचोड़, अस्तित्व का सार व्यक्ति के अंतिम शब्दों में निहित होता है।नाथूराम गोडसे की गोलियों से आहत गांधी जी के प्राण है राम कह कर ही छूटे थे।अंतिम सांस लेने से पहले भी गांधी जी ने कई बार राम का नाम जपते हुए ही अपने प्राण त्यागने की बात कही थी।यह तक कि गांधी जी ने अपनी मृत्यु से एक दिन पहले मनु से कहा था कि यदि वे किसी लंबी विमारी या व्याधि के कारण शैय्या पर दम तोड़ते है तो मान लेना कि वे महत्मा नहीं थे,लेकिन कोई बम विस्फोट या प्रार्थना सभा में जाते हुए उन्हें कोई गोली मारे और गिरते हुए उनके मुख से राम का नाम निकले,गोली मारने बाले के प्रति कोई कटुता का भाव ना हो तो उन्हें भगवान का दास माना जाएगा । गांधी जी ना केवल भारत वल्कि पूरे विश्व के आशा के केंद्र थे।गांधी जी का जन्म2 अक्टूबर1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुए था।गांधी जी को राष्ट्र पिता के रूप में जाना गया गांधी जी ने अंग्रेज़ो के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना तन मन धन परिवार सब कुछ अर्पण कर दिया था। गांधी जी की प्रतीकात्मक दृष्टि ने दुनिया भर के लोगों को किसी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया था।गांधी जी का प्रेरणात्मक उद्रण था_कि" यदि खुद को जानना है,तो दूसरों की सेवा में डूब जाओ"।

गांधी जी सच्चाई और अहिंसा के अग्रदूत थे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए आंदोलन शुरू किया था उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए सत्याग्रह आंदोलन सुरु किया था ।गांधी जी ने देश दुनिया की यह साबित के दिखाया था कि अहिंसा के मार्ग पर स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है।उन्नीसवीं शताब्दी के महान चिंतन एवं युग दृष्टा गांधी जी ने सन 1909 ने जिस हिन्द स्वराज लघु ग्रंथ का सृजन किया जिसमें कई स्वराज प्रेमी क्रांतिकारी भारतीय युवकों की बातचीत का सार काल्पनिक संवाद के रूप में ग्रंथित है।जिसका मुख्य ध्येय था कि सब लोगो का राज्य एवं न्याय राज्य होगा जिसमें सभी के लिए जाति,लिंग,भाषा,धर्म,में बराबर का स्थान होगा,उनके स्वराज्य में न कोई भूखा,न कोई नंगा,न कोई बिना पढ़ा लिखा,और न कोई बेरोजगार होगा ,राज्य के नागरिकों के साथ किसी तरह का भेद भाव नहीं किया जाएगा क्यो की स्वराज्य एक पवित्र वैदिक शब्द है।जिसका अर्थ ही है आत्म शासन और आत्मसंयम है।और स्वराज्य के माध्यम से ही जनता में इसबात की जानकारी कराई जाए कि सत्ता पर कब्जा कराने और नियमन करने की शक्ति स्वयं जनता में है।उनके स्वराज का मूल आत्म की आवाज है जो हम सभी के अंदर से आती है।

1929 में यंग इंडिया में भी गांधी जी ने लिखा था कि राम राज्य से मेरा अर्थ केवल हिन्दू राज्य ही नहीं है वल्कि मेरा मतलब इश्वरी राज्य अथवा भगवान का राज्य। उनका मानना था कि उनकी कल्पना के राम इस धरती पर रहें हो या नहीं फिर भी रामराज्य का प्राचीन आदर्श निः संदेह एक ऐसे सच्चे लोकतंत्र का है जहां सबसे कमजोर नागरिक भी बिना लंबी और महगी प्रक्रिया के जल्दी से जल्दी न्याय मिलने के प्रति आश्वस्त हो। मेरे सपनो का रामराज्य राजा और रंक को बराबर का अधिकार देना हो, रामचरित मानस में भी रामराज्य की व्याख्या गांधी जी के रामराज्य के विचारों से मेल खाती है,गांधी जी का धार्मिक ज्ञान भी निराला था,उनका धर्म भी रामराज्य की तरह पंथनिरपेक्ष था वे अपने आप को सनातनी हिन्दू धर्म तो कहते थे पर गांधी जी का हिंदुत्व वर्ण व्यवस्थाओ और धार्मिक अनुष्ठानों की कैद से आजाद था,गांधी जी ने धर्म की संभावनाओं को समानता सदभाव,बंधुत्व,स्वतंत्रता, जैसे सामाजिक राजनीतिक, आधारो पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की।गांधी जी ने अपने हिन्द स्वराज मे लिखा था कि,"मुझे तो धर्म प्यारा है मुझे पहला दुख यह है कि हिंदुस्तान धर्म भ्रष्ट होता जा रहा है,धर्म से मेरा मानना है हिन्दू मुस्लिम या किसी धर्म से नहीं वल्कि हम सभी के अंदर जो धर्म व्याप्त है वह हिंदुस्तान से जा रहा है,सत्य अहिंसा के पथ पर अडिग रहना,परायो की पीर के प्रति संवेदनशील होना,नैतिकता और साधन सुचिता को अपनाना,पशु बल का आत्म बल से सामना करना,अन्याय के आगे घुटने ना टेकना,आदि सभी गांधी जी धर्म के मूल हैजो सभी धार्मिक ग्रंथो का निचोड़ भी है।गांधी जी द्वारा अपनाई गई स्वधर्म की प्रार्थना भी धर्म में समाहित ,नैतिक,व्यापकता,सार्वभौमिकता और समानता को दर्शाती है।

गांधी जी ने हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख,ईसाई,जाति धर्म, के दर्जे को रामराज्य में कोई स्थान नहीं रखा वे शराब,नशा खोरी को ,हिंसा असत्य आदि को व्यक्ति की कमजोरी मानते थे।उनका मानना था कि समाज में व्याप्त इन सभी बुराइयों को आत्मनुशास न से दूर किया जा सकता है मेरा मानना है कि गांधी जी के राम राज्य की कल्पना बेरोजगारी हटाना, ट्रस्टी शि प ग्रामस्वराज्य, एवम् सर्वोदय की स्थापना करके,अछूतोद्धार,एवम् स्वदेशी की वस्तुएं अपनाकर, खादी को प्रश्रय देना,स्वावलंबी बनाने के साथ साथ,पंचशील व्रतो अहिंसा ,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य, एवम् अपरिग्रह को सन्नन्हित करके की जा सकती है,लेकिन कहीं ना कहीं आज के इस दौर में इन सभी का लोप होता जा रहा है।जब तक अन्त स के कल्मशो की सफाई नहीं है तब तक हम सभी स्वराज्य के योग्य नहीं हो सकते है क्यो की इसमें ऊंच नीच अपने पराए का भाव नहीं होता है अतः मै यह का सकती हूं कि आज के इस दौर में स्वराज्य के लिए बाह्य सुधारों की अपेक्षा आंतरिक सुधार करना भी जरूरी है क्यो की आंतरिक दुर्दशा पर खड़ा होने वाला सुंदर विधान भी जर्जर दीवार पर सफेदी की तरह है।

गांधी जी अपने स्वराज्य में कई कार्य सौंपते है उनके पास ज्यादातर एक व्यक्तिपरक दृष्टि कोण है उनका मानना था कि कम से कम शासन ही सबसे अच्छी सरकार है,वह लोगो को आत्मनिर्भर होने का आग्रह करते थे,गांधी जी के मुताबिक मनुष्य अकेले सहयोग से ही ऐसा कर सकता है,राज्यो में कोई किसी तरह की सहकारी शक्ति नहीं है यह तो केवल उन्हें आदेश और उनको दंडित कर सकता है को उनके आदेश का पालन नहीं करते।गांधी जी आदर्श राज्य में सभी कार्यों को सहयोग के आधार पर शांतिपूर्वक और अहिंसक रूप से किया जाएगा।राज्य के कार्यों के खिलाफ गांधी जी की तरफ से उठाई गई दूसरी आपत्ति व्यक्ति के विकास के दृष्टिकोण को लेकर थी।प्रत्येक व्यक्ति का जन्म कुछ अंतर्निहित गुणों से होता है,जिसे मुक्त वातावरण में विकसित किया जा सकता है राज्य जीवन के सभी क्षेत्रों को नियंत्रित करके व्यक्तित्व के विकास को बाधित करता है।

गांधी जी कहते है_" मै राज्य की शक्ति की बढ़ोत्तरी को उसका सबसे बड़ा भय मानता हूं,हालांकि शोषण को कम से कम करके अच्छा कर रहा है,लेकिन यह उस व्यक्ति को नष्ट करने वाला सबसे बड़ा नुकसान है,जो किसी भी प्रगति की जड़ होता है,मेरा विचार है कि रामराज्य में कानून के लिए साय द कोई जगह हो यह प्रेम और अहिंसा का शासन है जो संघर्ष और त्याग की भावना को रोकता है इसी लिए इसमें किसी भी प्रकार के मुकदमे बाजी के लिए कोई जगह नहीं है।यह कानून न्यायालय के अस्तित्व को प्रतिपा दित तो करता है,लेकिन यह वकीलों का कोई काम नहीं है,गांधी जी वकीलों के आलोचक थे,जिनका एक मात्र मकसद संघर्षों को सुलझाना नहीं,वल्कि प्रोत्साहित करते हुए उनमें पूजी बनाना है गांधी जी के लिए माध्यम से खोजो और जब मै सत्य की तलाश करता हूं तो अहिंसा कहती है कि उसे मेरे माध्यम से खोजो।उनका मानना था सत्य ही ईश्वर है के साथ साथ "भगवान सत्य है"।

अर्थात् मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जहा पर अहम भाव होता है वहां पर स्वराज्य नहीं होता है,इसी लिए स्वराज्य अहम भाव मिटाकर वयम भाव स्थापित करता है,वयम भाव में व्यक्ति-व्यक्ति नहीं रह जाता है,अपितु पिघल कर समाज बन जाता है।परंतु वर्तमान समय का रामराज्य गांधी जी के रामराज्य से बिल्कुल अलग है कहने का तात्पर्य है कि आज के युग में जगह जगह पर महिलाओ के साथ हो रहीजघन्य अपराध की घटनाएं हो,या नागरिकों के समानता की बात हो तो कोई तो बिस्तर पर सो रहा है तो कोई रोड पर लेटा है,कोई पेट भर के भोजन कर रहा है तो किसी को दो रोटी नसीब नहीं है ऐसे राज्य को हम राम राज्य नहीं कह सकते है,।क्यो की गांधी जी के रामराज्य में किसी प्रकार का भेदभाव ना हो,सभी समान अधिकार ,सुविधाएं प्राप्त हो।इन्हीं आदर्शो की अनुमति पर गांधी जी ने स्वराज्य को ग्राम राज्य एवम् राम राज्य की अवस्थिति होने की मीमांसा लोक जीवन के समक्ष रखी थी जिसमे सभी को समान अधिकार होगा,सभी अनुशासित और निरयोग होगे,सभी शिक्षित होगे।

इन सभी को देखते हुए आज के रामराज्य की परिकल्पना क्या होगी? क्या इस समय के राम राज्य की परिकल्पना तुलसी दास जी के रामराज्य की परिकल्पना के करीब होगी? क्या आज के रामराज्य में आपसी प्रेम सदभाव बढ़ाने के साथ साथ गैरबराबरी को खत्म करने और समाज के हर तबके को शारीरिक ,मानसिक और भौतिक तकलीफों से मुक्त दिलाने की बात की जाएगी जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा कि " दैहिक दैविक भौतिक तापा ,रामराज्य काहू हुं व्यापा।।, सब नर करही परस्पर प्रीति, चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति। चारी ऊ चरन धर्म जग माही, पुरि रहा सपनेहू अध नाही। नाहि दरिद्र कोऊ दुखी ना दीना,नाही कोड अबुधन न लच्छन हीना"।

अतः मै यह कह सकती हूं कि आज हमारे समाज में फैले जघन्य अपराध ,ऊंच नीच,जाति पाती के भेद भाव को मिटाने के लिए गांधी जी का रामराज्य घुटी का काम करेगा,मानव समाज में तुलसी जी की यह चौपाई आज भी प्रासंगिक है,अन्त में मै इतना कहना चाहूंगी कि आज स्वराज्य तो प्राप्त हो गया है पर रामराज्य के दर्शन कहीं नहीं हो रहे है मेरा राष्ट्र के सभी शासकों,नेताओ और लोक सेवकों का यह कर्तव्य है कि वे रामराज्य की विशेषताओं वाला शासन स्थापित करने के लिए हर संभव प्रयास करें,तभी गांधी जी की आत्मा को शांति मिलेगी और उनके रामराज्य की सार्थकता सिद्ध होगी।सुखी प्रजा ही रामराज्य का प्रमाण है आज उनकी 151 वीं पर उनको मै शत शत नमन करती हूं।


Next Story
Share it