युवा समझें वैश्विक राजनीति की जटिलताएं: कुलपति प्रो. संजीव कुमार
आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के न्यू सेमिनार हॉल में राजनीतिक विज्ञान विभाग एवं भारतीय राजनीतिक विज्ञान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में...

आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के न्यू सेमिनार हॉल में राजनीतिक विज्ञान विभाग एवं भारतीय राजनीतिक विज्ञान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में...
आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के न्यू सेमिनार हॉल में राजनीतिक विज्ञान विभाग एवं भारतीय राजनीतिक विज्ञान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में “आत्मनिर्भर भारत अभियान” के अंतर्गत “भारत की विदेश नीति का विकास एवं चुनौतियां” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का भव्य आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी ने अकादमिक जगत को एक सशक्त, विचारोत्तेजक और संवादपरक मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने की। शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना एवं वंदे मातरम् के साथ गरिमामय वातावरण में हुआ। प्रारंभ में डॉ. दीक्षा उपाध्याय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला, जबकि सूर्य प्रकाश अग्रहरि ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इसके उद्देश्यों एवं प्रभाव को रेखांकित किया।
देशभर से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने समकालीन वैश्विक परिदृश्य—विशेषकर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव—के संदर्भ में भारत की विदेश नीति की जटिलताओं, कूटनीतिक संतुलन एवं संभावित रणनीतियों पर गहन विमर्श किया।
इस अवसर पर संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन किया गया, जिसमें शोध सार एवं महत्वपूर्ण अकादमिक सामग्री संकलित है। साथ ही तीन महत्वपूर्ण पुस्तकों—“समसामयिक परिप्रेक्ष्य में भारत की वैश्विक दृष्टि: विश्व व्यवस्था और विदेश नीति”, “उभरती शक्ति की कूटनीति: भारत की विदेश नीति” तथा “भारतीय ज्ञान परंपरा: प्रशासन का विचार”—का लोकार्पण किया गया, जिसने कार्यक्रम को विशिष्ट अकादमिक गरिमा प्रदान की।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि भारत की विदेश नीति वर्तमान में संक्रमण के दौर से गुजर रही है, जहाँ वैश्विक शक्ति संतुलन, क्षेत्रीय संघर्ष और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलित एवं दूरदर्शी कूटनीति की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलताओं को समझने का आह्वान करते हुए कहा कि यही समझ उन्हें राष्ट्र निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने के योग्य बनाएगी।
मुख्य वक्ता प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी ने भारत की विदेश नीति को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित बताते हुए कहा कि भारत वैश्विक मंच पर नैतिक नेतृत्व प्रदान कर रहा है। उन्होंने पंचशील सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि इन सिद्धांतों ने देश को प्रारंभिक चुनौतियों से उबारने और आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रो. रजनीकांत पांडे ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए चीन के बढ़ते प्रभाव, पश्चिमी देशों के साथ संतुलन एवं पड़ोसी देशों के साथ सामरिक संबंधों को प्रमुख चुनौतियों के रूप में चिन्हित किया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. बी.के. सारस्वत ने प्रकृति से सीखने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विदेश नीति एक जीवंत एवं निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने युवाओं की सक्रिय भागीदारी को नीति-निर्माण के लिए आवश्यक बताया।
प्रो. रचना श्रीवास्तव ने विदेश नीति में मानवीय, सांस्कृतिक एवं लैंगिक आयामों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया।प्रो. अजीत प्रसाद राय ने भारत की विदेश नीति को लचीला, व्यावहारिक एवं परिणामोन्मुखी बताते हुए इसे वैश्विक मंच पर भारत के प्रभावशाली उदय का आधार बताया।डॉ. रजनी चौबे ने युवाओं को वैश्विक चुनौतियों—जैसे युद्ध, जलवायु परिवर्तन एवं आर्थिक असमानता—के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता बताई।डॉ. प्रीति चतुर्वेदी ने योग, आयुर्वेद एवं सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से भारत की सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करने पर बल दिया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन वैशाली सिंह तथा द्वितीय सत्र का संचालन अंशिता सिंह ने कुशलतापूर्वक किया। सेमिनार में लगभग 100 शोध पत्रों की ऑनलाइन एवं 75 शोध पत्रों की ऑफलाइन प्रस्तुति हुई, जिसने इसे एक व्यापक एवं सहभागितापूर्ण आयोजन बना दिया।
इस सफल आयोजन में सूर्य प्रकाश अग्रहरि, डॉ. दीक्षा उपाध्याय, शुभम राय एवं त्रिशिका श्रीवास्तव सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों एवं छात्र-छात्राओं का उल्लेखनीय योगदान रहा।अंत में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. अंजनी कुमार मिश्र ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।





