“हार्ड करेंसी बनी वैश्विक शक्ति का हथियार: अमेरिका–इज़राइल–ईरान तनाव के पीछे आर्थिक रणनीति”

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“हार्ड करेंसी बनी वैश्विक शक्ति का हथियार: अमेरिका–इज़राइल–ईरान तनाव के पीछे आर्थिक रणनीति”
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आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय में वाणिज्य विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में वैश्विक मुद्रा प्रणाली, आर्थिक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के जटिल संबंधों पर गहन विमर्श किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने की, जबकि मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, आगरा से पधारे प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. एल.एन. कोली उपस्थित रहे। कुलपति ने अतिथि का विश्वविद्यालय का प्रतीक चिह्न, अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत एवं सम्मान किया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि आज के वैश्वीकरण के दौर में शिक्षा का दायरा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि छात्रों को अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, आर्थिक नीतियों और वैश्विक शक्ति संतुलन को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान न केवल छात्रों के ज्ञानवर्धन में सहायक होते हैं, बल्कि उनमें शोध के प्रति रुचि भी विकसित करते हैं। कुलपति ने सभी प्राध्यापकों से अपेक्षा की कि वे छात्रों को समसामयिक विषयों पर शोध के लिए प्रेरित करें, ताकि वे वैश्विक स्तर पर हो रहे परिवर्तनों को समझ सकें और भविष्य की चुनौतियों के लिए स्वयं को तैयार कर सकें।

मुख्य वक्ता प्रो. एल.एन. कोली ने अपने विस्तृत और विश्लेषणात्मक व्याख्यान में “हार्ड करेंसी” की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि आज यह केवल आर्थिक विनिमय का साधन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और शक्ति प्रदर्शन का महत्वपूर्ण उपकरण बन चुकी है। उन्होंने अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे तनाव के संदर्भ में बताया कि किस प्रकार अमेरिकी डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के माध्यम से अन्य देशों पर दबाव बनाने की क्षमता प्रदान करती है।

प्रो. कोली ने उदाहरण देते हुए कहा कि ईरान जैसे देशों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण उनकी विदेशी व्यापार प्रणाली बाधित होती है, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, अमेरिका और इज़राइल जैसे देश अपनी मजबूत मुद्रा और वित्तीय प्रणाली के कारण वैश्विक बाजारों से संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर लेते हैं, जो उन्हें युद्ध अथवा संकट की स्थिति में भी स्थिर बनाए रखता है।उन्होंने आगे कहा कि जिन देशों के पास डॉलर, यूरो जैसी मजबूत मुद्राओं का पर्याप्त भंडार होता है, वे वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के दौर में भी अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखते हुए अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। इस प्रकार “हार्ड करेंसी” वैश्विक शक्ति संतुलन को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कार्यक्रम में वैशाली सिंह, डॉ. सुब्हान अल्लाह सिद्दीकी, डॉ. मानेंद्र यादव, डॉ. रोहित पांडेय एवं सहित कई प्राध्यापक उपस्थित रहे। बी.कॉम एवं एम.कॉम के छात्र-छात्राओं ने बड़ी संख्या में भाग लेकर विषय के विभिन्न पहलुओं पर अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त कीं और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों की गहन समझ विकसित की।कार्यक्रम का सफल संचालन वाणिज्य विभाग की छात्रा प्रीति यादव ने किया।

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