योग से स्वास्थ्य, प्रसन्नता और सामंजस्य का मार्ग प्रशस्त : मसुविवि में राष्ट्रीय संगोष्ठी
योग व्यक्तित्व विकास का विज्ञान, भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान : प्रो. शशिकांत द्विवेदीमहाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ एवं आईसीपीआर के...

योग व्यक्तित्व विकास का विज्ञान, भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान : प्रो. शशिकांत द्विवेदीमहाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ एवं आईसीपीआर के...
योग व्यक्तित्व विकास का विज्ञान, भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान : प्रो. शशिकांत द्विवेदी
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ एवं आईसीपीआर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में योग के वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर हुआ मंथन
आजमगढ़, 16 जून। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के योग विज्ञान विभाग एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को “स्वास्थ्य, प्रसन्नता और सामंजस्य के लिए योग” विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने योग को स्वस्थ, संतुलित एवं मूल्यपरक जीवन की आधारशिला बताते हुए इसके वैज्ञानिक, दार्शनिक तथा व्यावहारिक आयामों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। प्रो. प्रशांत राय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि योग भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तनाव, अवसाद और जीवनशैली जनित समस्याओं से मुक्ति के लिए योग की उपयोगिता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा और योग शिक्षा के संवर्धन हेतु किए जा रहे प्रयासों की जानकारी भी दी।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि योग भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है, जो संपूर्ण मानवता को स्वस्थ, संतुलित एवं अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाली समग्र जीवन-पद्धति है। नियमित योगाभ्यास व्यक्ति को तनावमुक्त बनाकर मानसिक एवं शारीरिक रूप से सशक्त करता है।
मुख्य अतिथि प्रो. शशिकांत द्विवेदी, योग दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि योग मनुष्य के शरीर, मन और चेतना को एकसूत्र में जोड़ने वाला विज्ञान है। उन्होंने कहा कि आज की प्रतिस्पर्धी और भागदौड़ भरी जीवनशैली में योग मानसिक संतुलन, आत्मानुशासन तथा आंतरिक शांति प्राप्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। विद्यार्थियों से योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि योग व्यक्ति को स्वयं, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए भी प्रेरित करता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. रविकांत तिवारी, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ,लखनऊ ने भारतीय ज्ञान परंपरा में योग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग भारत की ऐसी सांस्कृतिक विरासत है, जिसने विश्व को स्वास्थ्य, संतुलन और सामंजस्य का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि योग व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास का आधार है। योग के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर ही स्वस्थ, प्रसन्न एवं सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण संभव है।
संगोष्ठी के दौरान योग विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न योगासनों, प्राणायाम एवं ध्यान की विधियों का प्रदर्शन भी किया गया। प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए योग के व्यावहारिक पक्षों को समझा। वक्ताओं ने आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न तनाव, अवसाद एवं स्वास्थ्य संबंधी अन्य चुनौतियों के समाधान में योग की प्रभावी भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. पंकज सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. प्रशांत राय ने प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, कुलपति, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि योग के माध्यम से स्वस्थ, प्रसन्न एवं सामंजस्यपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में ऐसे कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।इस अवसर पर डॉ. वैशाली सिंह, त्रिशिका श्रीवास्तव, डॉ. मनीषा सिंह, डॉ. जय प्रकाश यादव, डॉ. निधि सिंह, डॉ. रोहित कुमार पाण्डेय, डॉ. शुभम राय, डॉ. कुलदीप यादव, डॉ. अनुराग सिंह, धीरज तथा डॉ. विजय प्रकाश उपाध्याय, सहित विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।





