राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर भाषा विवि में सजा भारतीय वस्त्र परंपरा का रंग
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग द्वारा राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर भारतीय हथकरघा परंपरा, स्वदेशी वस्त्र संस्कृति...
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग द्वारा राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर भारतीय हथकरघा परंपरा, स्वदेशी वस्त्र संस्कृति...
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग द्वारा राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर भारतीय हथकरघा परंपरा, स्वदेशी वस्त्र संस्कृति एवं स्थानीय बुनकरों के सम्मान में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय वस्त्र विरासत से परिचित कराने के साथ-साथ स्थानीय बुनकरों एवं कारीगरों के उत्पादों को प्रोत्साहित करना और उनमें ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना विकसित करना था।
कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा के संरक्षण में किया गया। इस अवसर पर गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. तत्हीर फात्मा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय हथकरघा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाने तथा स्थानीय बुनकरों एवं कारीगरों को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया।
हथकरघा फैशन शो रहा आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण हथकरघा फैशन शो रहा, जिसमें विद्यार्थियों ने देश के विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक हथकरघा वेशभूषाओं का आकर्षक प्रदर्शन किया। विद्यार्थियों ने खादी, बनारसी, चंदेरी, महेश्वरी, कांजीवरम, इकत सहित विभिन्न भारतीय वस्त्र परंपराओं को अपनी प्रस्तुति के माध्यम से जीवंत किया। फैशन शो के दौरान विद्यार्थियों ने विभिन्न वस्त्रों की विशेषताओं, उनके ऐतिहासिक महत्व तथा उनसे जुड़ी क्षेत्रीय एवं सांस्कृतिक पहचान के बारे में जानकारी साझा की। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि हथकरघा केवल वस्त्र या परिधान नहीं, बल्कि भारत की विविध संस्कृति, परंपरा और शिल्पकला की जीवंत अभिव्यक्ति है।
कहानियों और डॉक्यूमेंट्री से समझा बुनकरों का जीवन
इसके बाद आयोजित स्टोरी टेलिंग सत्र एवं डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय बुनकर समुदाय के जीवन, संघर्ष, मेहनत और उनकी पीढ़ियों से चली आ रही कला से परिचित कराया गया। सत्र के दौरान बताया गया कि किस प्रकार बुनकरों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित पारंपरिक तकनीकें भारतीय वस्त्र संस्कृति को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।
इस अवसर पर शिक्षकों ने विद्यार्थियों को स्थानीय कारीगरों एवं बुनकरों के सामाजिक और आर्थिक योगदान के प्रति संवेदनशील होने तथा भारतीय हस्तशिल्प एवं हथकरघा उत्पादों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
हथकरघा संरक्षण का लिया संकल्प
कार्यक्रम के समापन अवसर पर गृह विज्ञान विभाग के शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों ने हथकरघा प्रतिज्ञा (Handloom Pledge) ली। इस दौरान सभी ने भारतीय हथकरघा एवं हस्तनिर्मित वस्त्रों को अपनाने, स्थानीय बुनकरों को प्रोत्साहित करने, स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने तथा भारत की समृद्ध वस्त्र विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास करने का संकल्प लिया।कार्यक्रम में डॉ. कीर्तिमा सचान, डॉ. कल्पना देवी एवं डॉ. अंजलि सिंह सहित विभाग के शिक्षक, कर्मचारी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।





