एमएसडीयू में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित
आजमगढ़, 10 सितंबर 2026। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के मनोविज्ञान विभाग की ओर से विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर ऑनलाइन व्याख्यान...

आजमगढ़, 10 सितंबर 2026। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के मनोविज्ञान विभाग की ओर से विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर ऑनलाइन व्याख्यान...
आजमगढ़, 10 सितंबर 2026। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के मनोविज्ञान विभाग की ओर से विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आत्महत्या की रोकथाम के प्रति जागरूकता बढ़ाना, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना तथा जरूरतमंद लोगों को भावनात्मक सहयोग उपलब्ध कराने के लिए विद्यार्थियों एवं समाज को प्रेरित करना रहा इस वर्ष विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की त्रिवार्षिक थीम (2024-2026) “आत्महत्या पर विमर्श में बदलाव” रही, जिसका मुख्य आह्वान “संवाद की शुरुआत करें” है। ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.संजीव कुमार ने की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल अकादमिक शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व एवं मानसिक विकास का महत्वपूर्ण मंच है।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के प्रो. तुषार सिंह तथा वक्ता के रूप में जीएमसीएच, चंडीगढ़ के क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के डॉ. सत्यधर द्विवेदी ने प्रतिभागियों को संबोधित किया।
मुख्य वक्ता प्रो. तुषार सिंह ने कहा, “आत्महत्या को एक व्यक्तिगत कमजोरी या अपराध के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह एक रोकथाम-योग्य सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। हमें ‘आत्महत्या का अपराध करना’ जैसी पुरानी धारणा को छोड़कर ‘संकटकालीन मनोदशा’ जैसी वैज्ञानिक और मानवीय भाषा अपनानी होगी। वैश्विक स्तर पर हर साल 7 लाख से अधिक मौतें होती हैं और 15 से 29 वर्ष के युवाओं में यह मृत्यु के शीर्ष चार कारणों में है। इसका 75 प्रतिशत से अधिक भार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर है, इसलिए संवाद ही पहला उपचार है।”
वक्ता डॉ. सत्यधर द्विवेदी ने कहा, “आत्महत्या अचानक नहीं होती, व्यक्ति पहले संकेत देता है। व्यवहार में बदलाव, अकेलापन, निराशाजनक बातें, नींद-भूख में गड़बड़ी जैसे लक्षणों को समय रहते पहचानना जरूरी है। हमें जज करने के बजाय बिना पूर्वाग्रह के सुनना होगा।” उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘लाइव लाइफ’ रणनीति - साधनों तक पहुंच सीमित करना, मीडिया की जिम्मेदार भूमिका, जीवन कौशल विकास और शीघ्र पहचान पर जोर दिया।
कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन मनोविज्ञान विभाग के डॉ. परमानन्द पाण्डेय,डॉ. आशुतोष और डॉ. रेनू तिवारी द्वारा किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय विभिन्न संकायों के शिक्षकगण सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।अंत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन टेली-मानस - 14416 और किरण - 1800-599-0019 की जानकारी साझा की गई।





