रांगेय राघव शोधपीठ, एमएसडीयू में “जाग उठ मेरे हिंदुस्तान” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

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रांगेय राघव शोधपीठ, एमएसडीयू में “जाग उठ मेरे हिंदुस्तान” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
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आजमगढ़, 11 सितंबर 2026। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के रांगेय राघव शोधपीठ द्वारा “जाग उठ मेरे हिंदुस्तान - भारत में साहित्य, मानविकी और विज्ञान के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण पर विमर्श” विषयपर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (11-12 सितंबर) का शुभारंभ आजसेमिनार हॉल, एमएसडीयू परिसर में हुआ।कार्यक्रम का शुभारंभ पंजीकरण एवं जलपान के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्ज्वलन, देवी सरस्वती के माल्यार्पण एवं वंदना के पश्चात वंदे मातरम् और कुलगीत का गायन हुआ, जिसके बाद अतिथियों का स्वागत किया गया। संगोष्ठी का संचालन डॉ. मनीषा सिंह ने किया।स्वागत उद्बोधन में डॉ. अभय सिंह ने कहा, “रांगेय राघव शोधपीठ का उद्देश्य हिंदी साहित्य के उस अप्रतिम साहित्यकार की चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जिसने राष्ट्र और समाज को एक साथ देखा।”

शोधपीठ के संयोजक प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव ने रांगेय राघव के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया, “रांगेय राघव हिंदी के बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में, मूल नाम तिरुमलै नम्बाकम वीर राघव आचार्य। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, निबंध और जीवनी सहित अनेक विधाओं में लेखन किया। ‘कब तक पुकारूँ’, ‘मुर्दों का टीला’, ‘चीवर’ और ‘विषादमठ’ उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। 12 सितंबर 1962 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, परंतु उनका साहित्य आज भी राष्ट्रबोध का स्रोत है।”

कार्यक्रम के संरक्षक एवं कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में संगोष्ठी की थीम पर चर्चा करते हुए कहा, “राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का अर्थ संकीर्णता नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों, साहित्य और विज्ञान की स्वदेशी परंपरा को वैश्विक संदर्भ में आत्मविश्वास के साथ पुनर्स्थापित करना है। ‘सोने’ का अर्थ अपनी शक्तियों का स्मरण न करना है। युवाओं को जगाने से ही देश का विकास संभव है। दुनिया को विकसित बनाने में ड्राइवर से लेकर बड़ी कंपनियों के प्रमुख पदों तक भारतीयों का योगदान है। कोई भी विश्वविद्यालय डिग्री दे सकता है, लेकिन शिक्षा हमारे ऊपर निर्भर है। हमें सबसे पहले स्वयं के विकास पर ध्यान देना होगा और हमेशा अपने देश के विकास के बारे में सोचना होगा।

सम्मानित अतिथि, डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा, “राष्ट्रवादी साहित्यिक दृष्टि किसी विचारधारा का प्रचार नहीं, बल्कि अपने समाज की पीड़ा, संघर्ष और गौरव को अपनी भाषा में लिखने का साहस है।”मुख्य अतिथि, यूपीआरटीओयू प्रयागराज के प्रो. सत्यपाल तिवारी ने कहा, “भारतीय ज्ञान परंपरा को आयातित चश्मे से नहीं, बल्कि अपने शास्त्र, लोक और अनुभव के चश्मे से देखना होगा।”प्रथम सत्र में शोधार्थियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. राजेश गर्ग ने कहा, “हिंदुस्तान का भविष्य केवल आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक नेतृत्व में है।”

बीएचयू के प्रो. अनुराग दवे ने एआई और साहित्य के अंतर्संबंध पर चर्चा करते हुए कहा, “देश की मिट्टी केवल धूल नहीं होती। इंटरनेट ने बड़ा बदलाव किया है। एआई हमारी सहायता कर सकती है लेकिन दृष्टि नहीं बदल सकती। मानविकी और विज्ञान में विभाजन पश्चिमी देन है, भारतीय परंपरा में दोनों सत्य की खोज के माध्यम हैं।”

कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. देवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा, “यह संगोष्ठी केवल एक साहित्यकार को याद करना नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पुनर्जीवित करना है जो साहित्य को समाज से और समाज को राष्ट्र से जोड़ती है।”संगोष्ठी में एक सौ से ज्यादा प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र भी प्रस्तुत किये| सत्र के अंत में खुला प्रश्नोत्तर हुआ।

कार्यक्रम के अंत में शुभम राय ने आभार व्यक्त किया तथा सह-संयोजक सूर्य प्रकाश अग्रहरि ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।इस अवसर पर प्रो. गीता सिंह, प्रो. हसीन खान, प्रो. पंकज सिंह, डॉ. प्रियंका सिंह, डॉ. भंवर लाल, डॉ. परमानंद, डॉ. सचिन राय, डॉ. नितेश, डॉ. अंकुर, डॉ. महीप चौरसिया, डॉ. शिवेंद्र सिंह, डॉ. आर.डी. सोनकर, डॉ. दीक्षा उपाध्याय, रूपल सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के साथ प्रथम दिवस का समापन हुआ।

आज 12 सितंबर को सुबह 11 बजे हरिऔध कला केंद्र, आजमगढ़ में मुख्य सार्वजनिक सत्र का आयोजन होगा, जिसके मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार श्री पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ जी होंगे। विशिष्ट वक्ता के रूप में विभाग प्रचारक श्री दीनानाथ जी और पूर्व कुलपति प्रो. संजीत गुप्ता उपस्थित रहेंगे।

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