जागना होगा अपने भारत-बोध के लिए’, हरिऔध कला भवन में गूंजा राष्ट्रचेतना का संदेश

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जागना होगा अपने भारत-बोध के लिए’, हरिऔध कला भवन में गूंजा राष्ट्रचेतना का संदेश
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आजमगढ़, 12 सितंबर 2026। “हमें किसी और को जगाने से पहले स्वयं जागना होगा—अपने भारत, अपनी सभ्यता और अपनी ज्ञान परंपरा के लिए।” वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के इस आह्वान के साथ शनिवार को हरिऔध कला भवन राष्ट्रचेतना, भारतीय सांस्कृतिक विरासत और साहित्यिक विमर्श का केंद्र बन गया। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के तत्वावधान में रांगेय राघव शोधपीठ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ के मुख्य सार्वजनिक सत्र में साहित्य, भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रबोध और युवा शक्ति की भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई।

मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि भारत को केवल 15 अगस्त 1947 से शुरू हुई राजनीतिक इकाई के रूप में देखना उसकी हजारों वर्षों की सभ्यतागत निरंतरता को सीमित करना है। भारत की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, ज्ञान-दृष्टि और जीवन-मूल्य रहे हैं। उन्होंने युवाओं से अपनी जड़ों, इतिहास और महापुरुषों के विचारों को समझने तथा उन्हें जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चेतना का अर्थ केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध भी है। जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर कर्म, योग्यता और सामाजिक एकता को महत्व देने की आवश्यकता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महापुरुषों का मूल्यांकन उनकी जातिगत पहचान से नहीं, बल्कि उनके विचारों और समाज एवं राष्ट्र के लिए योगदान से किया जाना चाहिए।

रांगेय राघव के साहित्य में राष्ट्रजागरण की चेतना

शोधपीठ के प्रभारी एवं संगोष्ठी के संयोजक प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि रांगेय राघव असाधारण प्रतिभा के साहित्यकार थे। उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकों के माध्यम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र से जुड़े प्रश्नों को स्वर दिया। ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ जैसी रचनाओं में उनकी जागरण चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि रांगेय राघव ने साहित्यिक गुटबंदी से दूर रहकर स्वतंत्र चिंतन को प्राथमिकता दी और भारतीय परंपरा तथा नाथपंथ से जुड़े साहित्य पर भी महत्वपूर्ण लेखन किया।

युवा राष्ट्रचेतना के वाहक

पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ वक्ता प्रो. संजीत गुप्ता ने कहा कि रांगेय राघव और महाराजा सुहेलदेव की स्मृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने युवाओं से धैर्य, अध्ययन और चिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के कर्तव्यनिष्ठ आचरण से संभव है।

विभाग प्रचारक दीनानाथ ने भारतीय इतिहास में समाज को जागृत करने वाले महापुरुषों की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि रांगेय राघव ने भी अपने साहित्य के माध्यम से जनमानस में चेतना जगाने का कार्य किया। उन्होंने भारतीय जीवन-मूल्यों, स्वावलंबन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने पर जोर दिया।

ऑफलाइन और ऑनलाइन शोध-पत्र प्रस्तुत

संगोष्ठी के अकादमिक सत्र में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने ऑफलाइन एवं ऑनलाइन माध्यम से शोध-पत्र प्रस्तुत किए। ऑफलाइन सत्र में डॉ. आशुतोष कुमार मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग; पीएच.डी. शोधार्थी उपासना विश्वकर्मा, राजनीति विज्ञान विभाग, महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय; तथा विद्यार्थियों प्रतिष्ठा चतुर्वेदी और आकांक्षा तिवारी ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

ऑनलाइन सत्र में डॉ. प्रदीप कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय; पीएच.डी. शोधार्थी अभिषेक चौधरी, डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा तथा निधि अग्रवाल ने शोध-पत्र प्रस्तुत कर विषय पर अपने विचार साझा किए। शोध-पत्र प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने साहित्य, समाज, संस्कृति और राष्ट्रचेतना से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. वंदना पाण्डेय ने की। उन्होंने साहित्य, मानविकी और विज्ञान को परस्पर पूरक बताते हुए ज्ञान के समग्र दृष्टिकोण को आवश्यक बताया। कार्यक्रम में रांगेय राघव शोधपीठ की पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसके संपादक प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव तथा सह-संपादक डॉ. मनीषा सिंह हैं। कार्यक्रम का संचालन शुभम राय ने किया।

हरिऔध कला भवन में आयोजित सत्र में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक एवं नागरिक उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि भारत के भविष्य को सशक्त बनाने के लिए युवा पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति, ज्ञान परंपरा तथा संवैधानिक दायित्वों के प्रति जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा।

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