रंग से गुलाल से मन के उल्लास से होली हम मनाएंगे प्रेम से सौहार्द से

रंग से गुलाल से मन के उल्लास से होली हम मनाएंगे प्रेम से सौहार्द से



माघ मास के शुक्ल पक्ष को "बसंत पंचमी" मनाई जाती है। इसी दिन "रति काम" महोत्सव भी मनाया जाता है और इसी के साथ होली का उत्साह और "होलिका दहन" की प्रक्रिया आरंभ कर दी जाती है। ऐसी मान्यता है कि शुक्ल पक्ष एकादशी को "रंगभरी एकादशी" होती है इस दिन सभी देवता होली खेलते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि होली मनाई नहीं खेली जाती है जिसका रूप भारत के प्रत्येक प्रदेश में अपने-अपने अलग रंग रूप के साथ विविधता लिए हुए होता है।

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से सर्वत्र होली की हुड़दंग शुरू हो जाती है। होली शब्द जितना छोटा है उसका अर्थ उतना ही व्यापक, सबकी होली, अपनी होली, होने के बाद भी सबकी अपनी-अपनी होली होती है। बच्चों की अलग, युवाओं की अलग, वयस्कों की अलग तो बुजुर्गों की अलग। होली विभिन्नता में अभिन्नता का पर्व है।

होली एकमात्र ऐसा पर्व है जो मन की सभी दुर्भावनाओं का रेचन कर उसे शुद्धता और पवित्रता देता है क्यों? क्योंकि होली खेली जाती। होली खेली क्यों जाती है? क्योंकि खेल में खिलंदड़पन होता है। अब खिलंदड़पन क्यों होता है? क्योंकि इसी खिलंदड़पन (खिलवाड़) के कारण व्यक्ति अपनी समस्त कुंठाओं, वर्जनाओं से मुक्ति प्राप्त कर वैकुंठ की प्राप्ति करता है।

हमारे काशी में "होली" सुख यानि बैकुंठ प्राप्ति का साधन है; स्वर्ग की प्राप्ति का साधन है। काशी में होली के समय लोग गालियों का भरपूर प्रयोग करते हैं। अब ये गालियां क्यों देते हैं, भला इसका क्या प्रयोजन? ये गाली उनकी कुंठाएं हैं। उनकी वर्जनाएं है। जिसे अभिव्यक्त कर वह विभिन्न प्रकार की दुर्भावनाओं से मुक्त हो जाते हैं; एक उदाहरण - किसी ने कहा कि अरे! यह तो बड़ा काबिल है, यानि कि बढ़का बील है। अर्थात बड़ा गड्ढा है। इसमें एक खिलवाड़ है, एक खेल है। इन शब्दों में किसी को अपमानित करने का भाव नहीं है, किसी को आहत करने का भाव नहीं है। इसका तो सिर्फ आनंद लिया जा सकता है।

जिसके लिए यह शब्द कहा जा रहा है जब वह सुनता है तो उसे भी एक अनूठे आनंद की प्राप्ति होती है। वह भी ठठा कर हँसते हुए कहता है कि "का कमाल क व्याख्या कइला गुरु आनंद आ गयल।" ऐसे ही कई और भी शब्द हैं जिनका यदि संधि-विच्छेद किया जाए तो एक अलग ही तरह की प्रसन्नता से मन भर उठता है। होली पर कई तरह की अड़ियाँ लगती हैं, कहीं साहित्यकारों की, कहीं कवि गोष्ठियाँ, कहीं हास्य काव्य गोष्ठियाँ, कहीं फाग के गीत, कहीं नाटक जिसे होली के माहौल में "नौटंकी कहना अधिक उपयुक्त होगा कि गोष्ठियाँ, मंडलियाँ लगती थी।

इन सब के बाद "बुढ़वा मंगल" को नहीं बिसार सकते इसका भी अपना अलग ही रंग होता है। समय बीतने के साथ हमने अपने संस्कारों पर ध्यान नहीं दिया, जिसके कारण होली जैसे उत्साह पूर्वक पर्व पर मन दुखाने वाले शब्द अपमानित करने वाली दुर्भावनाओं ने रंगों के स्थान पर जहरीले रासायनिक तत्व, कींचड़ इत्यादि शत्रुता पूरी करने का साधन बन धीरे-धीरे इस पावन पर्व को विकृत करने लगा, जो कि व्यक्ति के समक्झ को सुंदर विस्तार न दे पाने के कारण हुआ।

होलिका दहन के दिन सभी अपने शरीर को उबटन से साफ करते हैं और उससे निकलने वाली मैल को उस आग में जला देते हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि होली इस बात का प्रतीक है कि तन के साथ-साथ मन की भी बहुत गहरे से सफाई होती है। बाबू हरिश्चंद्र लिखते हैं कि यही त्यौहार तुमरी म्यूनिसिपैलिटी है। यानि कि यह जो त्यौहार है इस पर हम सभी स्थानों की सफाई बड़े ढंग से कोने-कोने की सफाई करते हैं।

इन सभी सफाइयों के दौरान मन तो रह ही जाता है। तो होली एक ऐसा पर्व है जिसके खिलंदड़पन के कारण मन पर जमीं सारी गंदगियों की सफाई हो जाती है। यानी कि होली का पर्व "नगर निगम" है जो मन रूपी "नगर" को सुंदर, साफ एवं स्वच्छ रखने का कार्य करता है। होली के दिन सुबह से ही रंगों में सराबोर, सभी विभिन्न रंगों से "एक रंग" में होते हैं, कोई-कोई तो बिल्कुल पहचान में ही नहीं आते, यदि आपका मन नहीं भी है खेलने का, तो मित्र खींच कर अपने साथ ले ही जाते हैं, और एक दूसरे पर जी खोलकर भड़ास निकालते हैं। जैसे- छोटे बच्चे कहते हैं कि एतना चाँप के गरियइली गुरु कि मजा आ गयल ।

परंतु इस गाली में किसी को अपमानित करने का भाव बिल्कुल नहीं होता। शाम तक तन के साथ मन भी स्नान कर सभी मैलों को साफ कर, नये स्वच्छ, सुंदर, चमकदार विचारों के कपड़े पहन, एक दूसरे से अपनी कहावतों पर माफी मांग, सब एक साथ ठठाकर हँसते हैं; एक दूसरे से गले मिलते हैं। विभिन्न प्रकार की मिठाइयां खाते हैं। एक दूसरे के माथे पर अबीर लगाते हैं। महिलाएँ अपने पाकशास्त्र का अद्भुत प्रदर्शन करती हैं। बच्चे चहकते हुए घर - मोहल्ले गुंजायमान किए रहते हैं। घर पर बड़े बूढ़े सबका स्वागत करते हैं, सबको आशीर्वाद देते हैं। इस प्रकार यह होली का पर्व तन - मन को सुंदर बनाने का, हमारे समाज को एक श्रेष्ठ समाज बनाने का उत्तम एवं अद्भुत मनोवैज्ञानिक प्रयोजन है।

अस्तु, आप सभी के उत्तम स्वास्थ्य की संकल्पना में मैं, प्रतिभा प्रभा।

धन्यवाद।।

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