कोविड काल में मीडिया की भूमिका और सामाजिक चुनौतियाँ, प्रो गोविन्द जी पाण्डेय, संकायाध्यक्ष , मीडिया एवं संचार विद्यापीठ , बीबीएयू, लखनऊ

कोविड काल में मीडिया की भूमिका और सामाजिक चुनौतियाँ,    प्रो गोविन्द जी पाण्डेय,    संकायाध्यक्ष , मीडिया एवं संचार विद्यापीठ , बीबीएयू, लखनऊ


अपने होशो हवाश में लोगो ने कभी भी ऐसी महामारी नहीं देखी थी जिसमे वो अपने करीबियों से लेकर समाज के हर वर्ग के लोगो को करीब से मरते देख रहे थे | सभी ने स्पेनिश फ्लू, प्लेग और सबसे निकट द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मानवीय मूल्यों के पतन और उनकी बेबसी सुनी थी , पर इस बात का एहसास नही था की वो सुनी बाते हम लोगो के साथ भी आँखों देखी हो जायेगी |

जब मार्च २०२० में कोरोना का कहर भारत में शुरू हुआ तो लाकडाउन के समय लोग खुश थे की चलो अब परिवार के साथ कुछ वक्त मिला | जिनको बीमारी हो गयी वो अछूत की तरह हो गए और कोई मोहल्ला या कस्बा जब इसकी चपेट में आता तो अगल बगल दहशत का माहौल बन जाता था | कुछ दिनों की मौज कम होने लगी उसकी जगह अब धीरे –धीरे अवसाद ने घेरना शुरू किया | लोगो का व्यापार ठप हो गया | खाने पीने के चीजो की कमी होने लगी |

अब ऐसा लग रहा था कि इस अँधेरी गली से निकलने का रास्ता मुमकिन नही है |

प्रधानमंत्री सहित पूरा देश इस बात की प्रार्थना कर रहा था की महामारी अपना रौद्र रूप न धारण करे, पहली लहर के आंकड़ो और सरकार के प्रयास ने सुर्खिया बटोरी और लगा की इससे छुटकारा मिल जाएगा |

मीडिया भी अपने काम में लगा रहा | पत्रकार अपनी जान जोखिम में डाल कर लोगो की पीड़ा सब तक पहुचाते रहे | मीडिया के सन्दर्भ में दो बातें खास है जो पहली लहर को दूसरी लहर से अलग करती है | पहली लहर में जब मजदूर वापस अपने घरो को लौटने लगे तो मीडिया ने उनके संघर्ष की गाथा को लोगो तक पहुचाया |

लोग जागरूक हुए और लौटने वाले मजदूरों को गाँव के बाहर ही जगह देकर कोविड को फैलने से रोका गया | पर इस काम में कई मीडिया कर्मी शहीद हो गए और कई ने महीनो अस्पताल में संघर्ष के बाद किसी तरह जान बचाई |

मीडिया का मजदूरो का अपने घरों को वापस लौटने का किस्सा अंत आते आते सरकार और विपक्ष के बीच वाकयुद्ध में बदल गया | एक दुसरे को घेरने के चक्कर में वो कोविड को भूल गए पर भला हो जनता का की उसने नियम का पालन किया और हम कोविड की पहली लहर से बाहर निकलने लगे |

एक और बात जो मीडिया के पक्ष और विपक्ष दोनों में जाती है वो तबलीगी समाज का मीडिया में प्रस्तुतीकरण | एक समय ऐसा लग रहा था कि भारत में तबलीगी जमात ही कोरोना के फैलाव के लिए जिम्मेदार है | पर दोष उनको भी जाता है, क्योंकि वे सरकार के साथ सहयोग करने की जगह लुका छिपी का खेल खेलने लगे | वही कुछ मुस्लिम इलाको और एक ही समुदाय के लोगो का स्वास्थकर्मियों के साथ किया गया दुर्व्यवहार ने भी मीडिया की सुर्खिया बटोरी |

अब जब लगने लगा की कोरोना का कहर ख़त्म होने को है तो मार्च २०२१ और अप्रैल आते आते दूसरी लहर ने भारत को अपने चपेटे में ले लिया | इस बार लॉक डाउन की घोषणा उस तरह नही थी, जैसी पहले बार, पर सडको पर सन्नाटा पसरा था | इस बार के वाइरस ने ऐसी तबाही मचाई की लोगो के आँखों में आंसू कम पड़ गए | हर तरफ चीख पुकार मचा था, लोगो की अपनों के बाहों में दम तोडती तस्वीरों ने समाज को हिला कर रख दिया |

एक तरफ मरते लोग, कही बिस्तर की कमी तो कही आक्सीजन की कमी, अस्पतालों के बाहर लगी कतार ने लोगो को महामारी का सही मतलब बता दिया - पर इन्ही सब के बीच किसान आन्दोलन , कुम्भ और रमजान सब ने अपनी भूमिका इसके विस्तार में बखूबी निभाई | देश से बड़ा धर्म और लोगो की जिद हो गयी | इन सब के बीच कोरोना की वैक्सीन ने आशा की एक किरण दिखाई |

अब मीडिया में लोगो की पीड़ा और मरते लोगो की जलती तस्वीरों ने ले लिया था | ऐसा लगा की मीडिया का एक वर्ग गिद्ध की तरह इन लाशो को नोचने में लगा है और जितनी लाशें दिख रही थी उतने गिद्ध भी उसके आस पास दिखाई दे रहे थे |

वैक्सीन पर राजनीति शुरू हो चुकी थी | भारत के ग्लोबल रीच को कुछ मीडिया हाउस ने दिखाना शुरू किया और कुछ ने अपने नागरिको में वैक्सीन की कमी का रोना शुरू किया - वैक्सीन निर्माण की कहानी भी मीडिया में खूब छाई रही - भारत और भारतीयता को खूब दिखाया जा रहा था |

जैसे ही दूसरी लहर का प्रकोप बढ़ा स्वास्थ्य ढांचा चरमरा गया, अब विपक्ष को मौका मिला तो लोगो की सेवा करने की जगह प्रधानमंत्री को ही घेरने का काम शुरू कर दिया |

इस महामारी ने कई तरह के सामाजिक प्रश्न भी खड़े कर दिए है | बहुत सारे ऐसे बच्चे है जिनके माता पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी है और वो अनाथ हो गए है | वही इस महामारी में कई लोगो का पूरा परिवार ही ख़त्म हो गया | कही घर का कमाने वाला चला गया है तो कही घर की लक्ष्मी ही नही है |

घर पूरी तरह से बिखर चुका है और अब उन्हें समाज और सरकार की जरुरत है | हालकि सरकार ने ऐसे बच्चो की लिस्ट बनायीं है जिनके माता पिता या दोनों में से किसी एक का कोरोना के कारन निधन हो गया है | कई परिवारों में बुजर्ग ही बचे है |

सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि इन लोगो के जीवन यापन के लिए एक विस्तृत योजना बनायीं जाए जो भविष्य को ध्यान में रख कर हो | इनमे से कई लोगो की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होगी अतः उनको मनोवैज्ञानिको की मदद से पुनः मुख्य धारा में लाने का काम समाज और सरकार का ही है |

अपनों के जाने की जो पीड़ा है उसे जिन्दगी का संघर्ष और बढ़ा देगा - ऐसी स्थिति में सरकारी मदद अगर नही मिली तो समाज के अवांछित लोग इसका फायदा उठा सकते है |

इस महामारी का जो अधिकारिक आंकड़ा है उसके अनुसार तीन करोड़ से ज्यादा केस , २.९ करोड़ से ज्यादा लोग ठीक हुए और चार लाख के करीब लोगो की मौत | पर आम आदमी जानता है कि बीमारी और मौत का आंकड़ा इनसे कही ज्यादा है |

वैक्सीन लगाने वालो की संख्या करीब पचीस करोड़ होगी | दोनों वैक्सीन लगा चुके लोगो की संख्या चार करोंड के करीब है |

मीडिया कवरेज के निम्न बिंदु पर विचार करना चाहिए –

१) एजेंडा सेटिंग – एक समूह को टारगेट करने के कारण वैमनस्यता बढ़ी

२) अत्यधिक कवरेज – कई बार ऐसा लगता था कि मीडिया के पास कोविड के अलावा कोई और विषय ही नहीं है |

३) नेगेटिव रिपोर्टिंग – मीडिया का काम जहाँ कमियाँ दिखाना है वही उसको ये भी बताना है की कहाँ कौन अच्छा काम कर रहा है , पर मीडिया ज्यादातर समय नकारात्मकता में ही लगा रहा |

४) मीडिया एथिक्स का पालन – लोगो के मरते हुए विडियो , जलती लाशें और वीभत्स विसुअल ने कोविड काल में मीडिया एथिक्स को हासिये पर रख दिया |

५) मीडिया ओब्जेक्टिविटी का छरण – मीडिया एक पार्टी बनती नजर आई और उसकी खबरों में एकतरफा संवाद नजर आये | वो चाहे पक्ष की हो या विपक्ष की | महाभारत की तरह मीडिया में भी खेमा बन चुका था | जो किसी की तरफ नही थे उनकी आवाज गौण हो गयी |

६) फेक न्यूज़ का बोलबाला – खासकर सोशल मीडिया जिसमे व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक , प्रमुख है जहाँ फेक न्यूज़ ने अपना जाल फैला लिया था | सही गलत के बीच भेद कर पाना मुश्किल हो गया था |

७) सरकार को कोरोना सेंटर की स्थापना करनी चहिये जिसमे बच्चो को पढने और बड़ो को रोजगार मिल सके |

८) स्वास्थ्य सुविधाओ पर जोर देना होगा और भारत में डॉक्टर, नर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ की संख्या बढ़ानी होगी |

९) मीडिया को स्वंय ही नियम बना कर पत्रकारों को एथिक्स पालन के लिए मनाना होगा |

मीडिया के सामने चुनौतिया :

१) मीडिया हम सब लोगो की बात उठाता है पर उसकी बातों को सुनने वाला कोई नही है | उनकी नौकरी पर जब खतरा आया तो कोई भी सामने नहीं आया | मीडिया के लोगो ने कम पैसे में भी नौकरी की और लोगो का दुःख लेकर वो सबके सामने लेकर आया | अब समय आ गया है की मीडिया के लोगो के लिए एक राष्ट्रीय रोजगार पोर्टल अलग से बनाया जाय और मीडिया इंडस्ट्री के लोगो को उस पोर्टल पर अपने यहाँ की नियुक्तियों का विज्ञापन देना चाहिए जिससे नियुक्तियों में पारदर्शिता आये |

२) मीडिया हर तरह की नौकरी में हो रहे गड़बड़ियो में सवाल उठाता है पर मीडिया में नियुक्ति का मामला ही पारदर्शी नहीं है |

३) अगर मीडिया की नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी तो हर वर्ग के लोगो को जगह मिलेगी और सब का प्रतिनिधित्व मिलेगा |

४) मीडिया में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के कारण सरकार को बोलने का हक नही है पर मीडिया और पत्रकारों की भूमिका को देखते हुए सरकार को अपनी भूमिका निभानी चाहिए |


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