हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को मुंबई से बाहर लाना ही यूपी और बिहार के लोगो के लिए लाभकारी होगा

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को मुंबई से बाहर लाना ही यूपी और बिहार के लोगो के लिए लाभकारी होगा

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के नाम पर चल रहा बॉलीवुड आज देश के सबसे बड़े हिंदी क्षेत्र से दूर है | उन कारणों की पड़ताल करने के जरुरत है जहा पर मराठी बोले जाने वाले क्षेत्र में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री स्थापित हो गयी है |

स्किल्ड वर्कर - किसी भी इंडस्ट्री की सफलता के लिए जो सबसे अहम् चीज है वो है आपका काम करने वाले लोग | इसके लिए भारत सरकार ने फिल्म और टीवी इंस्टिट्यूट के अलावा फिल्म के तमाम सेंटर मुंबई और आस पास के क्षेत्र में बना दिया | जिसका परिणाम ये निकला की देश भर का नौजवान अपने सपनो को पूरा करने के लिए मुंबई का रुख करने लगा |

कनेक्टिविटी - ये भी किसी उद्योग के फलने -फूलने के लिए जरुरी हिस्सा है | मुंबई हमेशा से राजनीतिक और आर्थिक केंद्र के तौर पर रहां जिसके कारण वहा पर रेल , एयर , और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण बेहतर हो गया - इन कारणों से एक बढ़ी शहरी आबादी वहा आ गयी जो न सिर्फ हर प्रदेश के अच्छे लोग थे | उन लोगो ने अपने मेहनत से मुंबई को एक केंद्र के रूप में विकसित कर दिया |

फाइनेंस - किसी भी उद्योग का मुख्य विकास उसमे लगने वाले धन से होता है और आर्थिक राजधानी होने के कारण मुंबई में देश -विदेश से आने वाले धन की कोई कमी नहीं थी | इस तरह मुंबई ने मराठी की प्रमुखता होने के बावजूद भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को न सिर्फ स्थापित किया बल्कि उसका फायदा भी अब उसे मिल रह है |

भाषाई फिल्मों के सीमित विकास ने भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को मुख्य केंद्र बना दिया और मुंबई पुरे विश्व में एक बड़े सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभर गया | सारा कुछ हिंदी क्षेत्र का चाहे वो कलाकार हो या लेखक , सब हिंदी भाषी पर केंद्र महाराष्ट्र |

कमजोर नेतृत्व - किसी भी राज्य के विकास में कमजोर नेतृत्व हमेशा से एक बढ़ी खायी रही है | उत्तरप्रदेश और बिहार हमेशा से बड़े राजनेता पैदा करते रहे पर वो इन प्रदेशो के विकास की सुध कभी नहीं ली - उन्होंने इसे अपने जमींदारी के रूप में ही लिया जहा पर उनका चुनाव जितना उनके नाम , पार्टी और जात पर निर्भर होता था | स्वतंत्रता के सत्तर साल तक अमेठी और रायबरेली पर कांग्रेस का राज रहा पर विकास के नाम पर आज भी कच्ची सड़के है |

अगर यही दक्षिण का कोई राजनेता होता तो उत्तर प्रदेश और बिहार भी बीमारू नहीं भारत के विकास के इंजन होते | पर दुर्भाग्य आज भी उत्तर प्रदेश का मतदाता जाति के नाम पर वोट करता है काम के नाम पर वो रोता रहता है | जब जाति के नाम पर वोट करोगे तो रोने के सिवा और क्या रास्ता |

भविष्य - आज उत्तर प्रदेश में एक मजबूत नेतृत्व है और आजादी के सत्तर साल बाद कोई सरकार है जो पूर्वांचल और बिहार की सुध ले रही है | हमें ये मौका गवाना नहीं चाहिए - इस सरकार को अगर मौका मिला तो वो अपने विकास की रफ़्तार को दुगना कर सकती है | आज बनारस , आजमगढ़ , गाजीपुर , बलिया , अयोध्या , लखनऊ अगर विश्व के नक़्शे पर दर्ज हो रहे है तो उसका श्रेय इस सरकार को जाता है जिसने यहाँ भी बुनियादी सुविधाओ को बढाया है -

अगर ये सरकार ठान ले तो हम अगले दस साल में लखनऊ और बनारस को फिल्म निर्माण के केंद्र के रूप में विश्व पटल पर ला सकते है - जरुरत है फिल्म निर्माण के केंद्र की शाखा लखनऊ और बनारस में खोलने की - अगर इस दिशा में प्रयास किया जाए तो किसी भी सुशांत को मुम्बई में जान देने की जरुरत नहीं पड़ेगी |

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