खुशियों कि सौगात है बचपन...

खुशियों कि सौगात है बचपन...

हिमांशी पाण्डेय

बचपन कोई शब्द नहीं जिसका वर्णन किया जा सके यह तो वो एहसास है जिसे सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है | जैसे पापा की उंगलियां पकड़ कर चलना, तो कभी मम्मी कि गोदी में लेट कर दूध पीना, कभी दादी से परियों की कहानी सुनना तो कभी गर्मियों की छुट्टी में नानी के घर जाने की जिद करना | यहीं तो है वो बचपन जिसे बयां नहीं सिर्फ महसूस किया जा सकता है । प्यारा सा शब्द है बचपन, वहीं किसी की आस है बचपन, किसी का गुजरा हुआ कल है बचपन तो किसी का आने वाला कल है बचपन। गिर-गिर के उठना है बचपन और उठ-उठ के गिरना है बचपन । भाई बहन से लड़ना है बचपन तो गलती करने पर पापा कि डांट से बचने के लिए चुप चाप मम्मी के आँचल में छुपना है बचपन| किसी के लिए सपनों का शहर है बचपन तो किसी के लिए बुरी तस्वीर सा है बचपन। बचपन कहें तो वो जो अंदर से दरवाजा बंद कर बड़ो की परेशानी बन जाए, बचपन वह जो अपने छोटे भाई को अपनी फ्राक पहना कर उसके साथ कही गुम हो जाए, किसी के लिए जिंदगी में प्यार की पढ़ने वाली पहली सुन्दर किरण है बचपन तो किसी के लिए गलतियों का भंडार है बचपन। पर कुछ भी कहो शरारत, शैतानी और खुशियों का त्यौहार है बचपन।

बचपन एक वो मासूम

शब्द है जिसे सुन किसी कि भी पलक भीग जाए, मानों जैसे कि अपने आज में फना हो और

फिर से उसी बचपन कि निराली दुनियां मे पहुंच जाए, जहां ना कोई जाति, धर्म, क्षेत्र

कि कोई लकीर होती, ना ही क्या तेरा क्या मेरा क्या अपना क्या पराया जैसे शब्दों कि

जगह होती, होता है तो बस सिर्फ सब मेरा है और जो मेरा है वो तेरा है। बचपन मानों

तो सहेली के घर जाकर घर-घर खेलना और उसके भाई के साथ घर बसना, गुड्डों-गुडियों कि

शादी करना और फिर उन्हीं के गौना पर रोना, जिंदगी को सहीं तरीके से जीना सिखाना और

फिर उसी तरीके को किसी और कि सोच से जोड़ना और उस सोच को आगे बड़ना है बचपन।

आज देश में उस

प्यारे से बचपन कि याद दिलाना बेहद जरुरी है, जो आज के आधुनिक दौर में प्रोद्योगिकी

के चलते कहीं खो सा गया है, क्योंकि हमें बचपन को कठोर और क्रूर नहीं बल्कि

मयूरपंख-सा मुलायम और मुस्कुराहट से भरा बनाना है। ताकि फिर से एक बार मासूम बचपन

को बचपन कह सके ना कि प्रोद्योगिकी से भरा बजार।

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