गुमनाम रहे गणित के गुरु वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन

भारत में मेधा का कितना अपमान होता है उसका एक उदाहरण सामने आया है जब गणित के महान वैज्ञानिक वशिष्ठ नारायण सिंह शिजोफ्रेनिया से पीड़ित होने के कारण खून की उल्टियां करते हुए मर गए।जिस घड़ी ताकि को देश विदेश में लगातार मौका मिलता रहा पर उसने विदेश की जगह देश सेवा का व्रत लिया उसकी ऐसी दुर्गति भारत जैसे देश में ही हो सकती है।

पटना सरकार ने तब उनकी खबर लिए जब वह मौत के करीब आ चुके थे एक ऐसे गणितज्ञ जिन्होंने अपनी प्रतिभा से विदेश में अपना सिक्का जमाया उससे सरकारी हमलों का दूर होना हर तरह की सहायता न दे पाना प्रशासन की विफलता ही मानी जाएगी।जहां हदीस कोशिश करता है कि उनके यहां इस तरह के वैज्ञानिक बने रहे पर गुमनामी में मौत भारत में ही संभव है।

1946 में जन्मे वशिष्ठ नारायण सिंह 1969 में जब अपना शोध कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया तो बहुत सारे विदेशी प्रोफेसरों ने उनको वहीं रुक कर अपने शोध को आगे बढ़ाने के लिए कहा।भारत की भर्ती से प्रेम करने वाला यह प्रोफेसर भारत चलाया और कुछ पारिवारिक कारणों से कुछ सांसारिक कारणों से दिमागी संतुलन गड़बड़ा या और भारत का चमकता सितारा गुमनामी के अंधेरे में खो गया।इंग्लिश का जो ऐसे लोगों की कदर नहीं करता और उन्हें ना उचित सहायता मिली नहीं चिकित्सा जिसके दुष्परिणाम सामने कभी-कभार अखबारों में आते थे।

अभी भीख मांग कर गुजारा करते वशिष्ठ नारायण की फोटो अखबारों में छपती थी तो कभी किसी जगह पागल की तरह उनको प्रस्तुत किया जाता था।वशिष्ठ नारायण के साथ हुए इस तरह के रूप में सिर्फ सरकार ही नहीं देश की जनता भी जिम्मेदार है जिन्होंने ऐसे ही रे को सच ओके नहीं रखा आने वाला समय हम सभी को इस बात की याद दिलाता रहेगा कि वशिष्ठ नारायण जैसा हीरा भारत जैसे देश में ही गुमनामी के अंधेरे में खो सकता है।

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