स्नान दान महा पुण्य कारी मकर संक्रांति कल (15 जनवरी )
सूर्यदेव ब्रह्मांड में ऊर्जा के सबसे बड़े केन्द्र हैं। उत्तरायण के सूर्य होते ही चराचर जगत में एक नया माहौल देखने को मिलता है। पुराणों में भगवान सूर्य...

सूर्यदेव ब्रह्मांड में ऊर्जा के सबसे बड़े केन्द्र हैं। उत्तरायण के सूर्य होते ही चराचर जगत में एक नया माहौल देखने को मिलता है। पुराणों में भगवान सूर्य...
सूर्यदेव ब्रह्मांड में ऊर्जा के सबसे बड़े केन्द्र हैं। उत्तरायण के सूर्य होते ही चराचर जगत में एक नया माहौल देखने को मिलता है। पुराणों में भगवान सूर्य को आरोग्यता, ऐश्वर्य, धन, सुख, इच्छा परिवार विकास तक की प्राप्ति का कारक माना गया है। सूर्य आराधना का महत्पर्व मकर संक्रांति भगवान भाष्कर के दक्षिण से उत्तरायण होने का का है। दक्षिणायन में धरती वासियों पर चंद्रमा का प्रभाव अधिक होता है, जबकि उत्तरायण में ग्रहराज सूर्यदेव ज्यादा प्रभावित होते हैं। जीव की उत्पत्ति और जीवन को साकार करने वाले प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य हैं। बिना इनके जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। उत्तरी गोलार्द्ध देवों का, दक्षिणी पितरों का|
प्रख्यात पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार ज्योतिषशास्त्र में उत्तरी गोलार्द्ध को देवताओं का निवास स्थान माना जाता है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध पितरों का क्षेत्र कहा गया है। सूर्य देव का उत्तरायण काल मकर से मिथुन राशि तक छह माह और दक्षिणायन काल कर्क से धनु राशि तक छह माह माना जाता है। संक्रांति शब्द का अर्थ है सूर्य या किसी ग्रह का एक राशि से दूसरे राशि में संक्रमण या संक्रांति होना है। जब सूर्यदेव धनु व मीन राशि पर आते हैं तो उसे खरमास कहा जाता है।
पर्व की तिथि व पुण्यकाल इस बार भगवान भाष्कर का धन से मकर राशि में प्रवेश 15 जनवरी की भोर 03.01 मिनट पर होगा। अतः मकर संक्रांति पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। धर्मशास्त्र के अअनुसार भगवान भाष्कर के मकर में प्रवेश काल से 32 घटी अर्थात 12 48 मिनट आगे तक पुण्यदायी काल माना जाता है। निर्णयसिधुकार ने मकर संक्रांति के संबंध में सभी मतों को उद्धृत किया है जिसमें माधव का मत है कि "यदि रात्रि में सूर्य देव का धन से मकर राशि में संक्रमण हो तो दूसरे दिन मकर संक्रांति का पुण्यकाल माना जाए।
उत्तर भारत में इस शुभ पर्व पर पतंग उड़ाने की भी परम्परा है। मकर संक्राति पर काशी, प्रयाग व गंगासागर में गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। जो लोग गंगा स्नान नहीं कर पायें, वो सभी स्वस्थान पर ही नदी, कुंआ, बावड़ी, सरोवर में मां गंगा का स्मरण कर स्नान करने से पुण्यलाभ मिलता है |
दान अवश्य करें: इस दिन स्नान के बाद भगवान भाष्कर को अर्घ्य अवश्य दें। तत्पश्चात गायत्री मंत्र, सूर्य चालीसा, सूर्य सहस्रनाम, आदित्यहृदयस्त्रोत सूर्यमंत्र आदि का पाठ या जप करें। इस दिन दान का भी विशेष महत्व है। दान में कम्बल, घृत, ऊनी वस्व, अन्न, स्वर्ण, तिल, गुड़, खिचड़ी आदि ब्राह्मणों, गरीबों को देना चाहिए,|
पुराणों में यह पर्व मकर संक्रांति का महत्व सर्वोपरी बताया गया है। द्वापर के महाभारत काल में बाण पर पड़े भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति पर ही देह त्याग किया था। इसी दिन मां गंगा ने कपिलमुनी के श्राप से सगर के 60 हजार पूत्रो को भी मोक्ष प्रदान किया था |





