आधुनिकता के बीच ग्वालियर मेले में जीवित हैं परंपरागत दुकानें
लगभग 121 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ग्वालियर मेले ने समय के साथ आधुनिक स्वरूप अपना लिया है, लेकिन परंपरागत दुकानें आज भी इसकी पहचान बनी हुई हैं।...

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लगभग 121 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ग्वालियर मेले ने समय के साथ आधुनिक स्वरूप अपना लिया है, लेकिन परंपरागत दुकानें आज भी इसकी पहचान बनी हुई हैं।...
लगभग 121 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ग्वालियर मेले ने समय के साथ आधुनिक स्वरूप अपना लिया है, लेकिन परंपरागत दुकानें आज भी इसकी पहचान बनी हुई हैं। रेडियो-घड़ियों की जगह इलेक्ट्रॉनिक शोरूम और छोटे झूलों की जगह बिजली से चलने वाले बड़े झूले लग गए हैं, फिर भी घोड़ा-बैल सजावट सामग्री, घुंघरू, घंटी, मंजीरा और लकड़ी के बैंत जैसी दुकानों की मांग बनी हुई है। कई परिवार तीन-चार पीढ़ियों से ये दुकानें लगाते आ रहे हैं। ग्रामीण अंचल के लोग आज भी इन परंपरागत वस्तुओं के लिए मेले का इंतजार करते हैं।
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