वो चार लोग.....

वो चार लोग.....

हिमांशी पाण्डेय

मेरी जिंदगी की चक्की धीमें मगर चल रहीं है, उन चारों लोगों के कारण कहें या खुद में विश्वास होना कहें। जब मैं करीब 9 साल की थी तब मै अपने स्कूल में पहली बार रेस में प्रथम आई थी| उस दिन मेरे पिता के चेहरे पर गर्व दिखायी दे रहा था| उस समय मैं गर्व का मतलब तक नहीं जानती थी, मगर उन्हें खुश देख कर अच्छा लगा। जैसे की उन्हें पता था की रेस में तो मैं ही जीतूंगी। अब मेरी 10वीं की परीक्षा आ गई थी हर समय रिस्तेदार के फोन आते थे कि अब तो 10वीं की परीक्षा है कैसी चल रहीं है तैयारी कभी पढ़ाई के बारे इतना नहीं सोचा लेकिन जिंदगी में पहली बार डर लगा पर फेल होने का नहीं पापा से पीटने का तब एक शाम पापा के पास बैठी उनके लिए चाय- पकौड़ी बनाई और बड़े ही प्यार से पूछा की पापा अगर मैं 10वीं की परीक्षा में फेल हो गई तो मारोगें तो नहीं, पापा मेरी बात सुनतें ही हल्का सा मुस्कुराये और मुझे जमीन दिखाई| मैनें कहा पापा में फेल होने की बात कर रहीं हूँ और आप जमीन दिखा रहें हो| तब पापा ने कहा गौर से देखों एक बार जमीन में क्या दिख रहा है| मैनें देखा की एक चींटी अपने घर जा रहीं थी की तभी पापा ने उसके रास्तें में चाय का गिलास रख दिया उसनें चाय के गिलास को पार कर लिया और आगे बढ़ गई |फिर पापा ने चाय का गिलास रख दिया चींटी फिर से उसे पिछे छोड़ कर आगें बढ़ गई और अपनें घर पहुंच गई| तब पापा ने मुझसें कहा की तुम किसी भी चीज का पहले ही परिणाम सोच कर मत डरों बस मेहनत करतें हुए चलतें रहो| फिर मैं पापा की बात सुन कर अपने कमरें में आ गई| उस वक्त तो ये ज्ञान मेरें छोटे से दिमाग के लिए समझना बहुत बड़ी बात थी बस पापा से बात करके इतना समझ में आया की अगर फेल हो गई तो पापा मारेंगे तो नहीं जो मेरे लिए खुशी की बात थी। अब मेरी 10वीं का परिणाम आ गया जिसमें मेरी मेथ्स में कम्पार्टमेंट आ गई जिससें मैं तो निराश थी और साथ ही मेरे पापा का चेहरा भी उतना खुश नहीं था जो बात अब मेरें समझ में आनें लगी थी | फिर कुछ दिन बाद कम्पार्टमेंट का पेपर था। तब मै मुँह लटका के अगले दिन मेथ्स लेकर बैठ तो गई लेकिन जो सवाल मुझे पहले सता रहें थे वो मुझें अब भी परेशान कर रहें थे| फिर अचानक मेरी नजर उन चीटियों पर दोबारा पड़ी अब मैनें गुस्सें में पानी से भरे गिलास का पानी फैंका और चींटी के ऊपर रख दिया तब मैनें कहा सामनें रखी चीजों को तो पार कर लेती हो जरा अब निकल कर दिखाओं | जैसे की मेरा मेथ्स के साथ हाल हो गया था। तभी मैने देखा जहा से सतह और गिलास में हलका सी जगह थी वहीं से चींटी को बाहर आते देखा और मैं सन्न रह गई | तब मैनें सोचा की हमारी परेशानियों को हम ही पार करेंगे दूसरा और कोई नहीं | फिर मैं पढ़ी और मैनें कम्पार्टमेंट का पेपर भी पास कर लिया |जिसके बाद मैं कभी किसी विषय में फेल नहीं हुई और 12 भी पास कर लिया |साथ ही और कुछ साल बाद मेरी ग्रेजुएशन भी हो गई और साथ ही मेरी पढ़ाई के तरफ रुची भी बढ़ती गई अब बात थी मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन की जिसके लिए मैं एक युनिवर्सिटी में दाखिला लेना चहती थी |उस युनिवर्सिटी के लिए मैने सालों से मेहनत करी थी दिन रात एक किया था |और उस युनिवर्सिटी का पेपर भी निकाल लिया अब बारी थी साक्षात्कार की | मैनें साक्षात्कार दिया मुझें पूरी उम्मीद थी की मेरी लगन और मेहनत के चलते मेरा नाम जरुर आयेगा पर नहीं आया |उस दिन सारा मनोबल गिर गया ऐसा लगा जैसे की मानों क्या हाथ से निकल गया मैं बहुत निराश हो गई रोई भी उसी रात खुले आसमान के नीचे अपनी बहन के साथ लेटी थी की तभी एक और युनिवर्सिटी का परिणाम देखा जिसमें एक अच्छें रेंक का साथ मेरा नाम आ गया |खुशी हुई पर कहीं ना कही मन अब भी वहीं था बहुत उलझन में थी क्या करो किस से बात करो फिर एक रोज मैने अपने सीनियर से बात की उन्हें अपनी उलझन के बारे में तब उन्होनें मुझे समझाया की युनिवर्सिटी कोई भी हो देखा जाता है तो वह इंसान की काबिलियत जो तुम्हारें अन्दर है | बस ये सुन कर एक हिम्मत मिली और मैने उस युनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया जो मैनें अपनी मेहनत से निकाली थी |उस युनिवर्सिटी में मुझें एक ऐसे सर मिलें जिन्होंनें मेरी काबिलियत समझी और उसे देखा साथ ही मुझें उसे निखारने का रास्ता भी बताया और आज मैं अच्छे मुकाम मे हू और अपनी जिंदगी अच्छें से जी रहीं हू | साथ ही उन चार लोगों के बारें में सोचती हू जिन्होंनें मुझें मेरी जिन्दगी में इतनी मुश्किलें होनें के बावजूद भी जिन्दगी जीना सिखा दिया | साथ ही मैं उस चींटी को भी उन लोगों में देखती हू जिन्होंनें जिन्दगी की मुश्किलें से लड़ना सिखा दिया | और आप लोगों से यह कहती हू कि जिन्दगी का पता नहीं कब किन से मिलवा दे जो आपको जीने का और लक्ष्य को पाने का एक अलग तजुर्बा सिखा दे

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