लोकतांत्रिक महापर्व की पूर्णाहुति-आपका एक मत

Update: 2024-04-16 08:30 GMT

 डा. प्रविता त्रिपाठी, राजनीति विज्ञान विभाग, आर एन एस डिग्री कालेज, सरवां, लखनऊ 

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है यहां की संघीय सरकार प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल पर चुनाव के माध्यम से चुनी जाती है देश के नागरिक इस चुनावी प्रक्रिया में सीधे तौर पर भाग लेते है। आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत ,लोकतंत्रिक महापर्व की तैयारी में लगा हुआ है भारत में लोकसभा के चुनाव विश्व के सबसे बड़े मतदान पर्व के रूप में जाने जाते है ,लोकतंत्र की परिभाषा में जनता का,जनता के लिए,जनता के द्वारा वाक्यांश सार्थक करने वाला जो शक्तिशाली माध्यम है वह है- मत। मत की शक्ति का आंकलन एवम उसके सकारात्मक प्रभाव को सरकार द्वारा किए गए कार्यों से देखा जा सकता है।जिस मत का प्रयोग राष्ट्र की दशा एवम दिशा को सकारात्मक रूप से परिवर्तित करने हेतु किया जाता है, वह मत व्यापक होता है अब प्रश्न उठता हैं कि यदि मत जनता का अधिराकर है तो उसके साथ दान शब्द का प्रयोग क्यों किया जाता है? दान की अपनी महत्ता है,शास्त्रों में दान का बड़ा व्यापक अर्थ है,यह ऐच्छिक होता है किंतु यह मनुष्य की सभी इच्छापूर्ति का साधक भी होता है ।दान के माध्यम से मनुष्य अपना यहलोक और परलोक सफल बनाता है इसी प्रकार से मतदान का भी यही अर्थ है कि सकारात्मक मतदान,मतदाता के लिए सुनहरे भविष्य का

निर्माता होता है। मत शब्द का अर्थ विचार या विचारों के प्रवाह से है,जो जनमानस के मस्तिष्क में निरंतर प्रवाहित होते है।शिक्षा, संस्कृति उत्थान,न्यास के प्रचार प्रसार द्वारा एक मत की शक्ति का आंकड़ा बड़े प्रभावशाली ढंग से संकलित किया जाता है।यदि नागरिक यह सोचे कि मेरे एक मत से क्या प्रभाव होगा तो यह विचार भी आवश्यक है कि समुद्र का निर्माण बूंदों से ही होता है समाजवादी विचारक श्री राममनोहर लोहिया जी ने भी कहा था कि यदि सड़क शांत हो जायेगी तो संसद आवारा हो जायेगी ।परंतु लोहिया जी के यह विचार आंदोलनों एवम प्रदर्शनों से

संबंधित थे लोहिया जी के इन विचारों का अर्थ अनिवार्य मतदान के रूप में भी ग्रहण कर सकते है। वैदिक सूक्त में संगचछ्वम ,संवद्धवम का भाव एक सकारात्मक सूत्रपात का प्रतिपादन करता है यह वाक्यांश साथ चलने और साथ विचार करने का भाव न कि देश के टुकड़े टुकड़े करने के लिए भी,अपितु देश को अखंड एवम सुदृण बनाने एवम जनकल्याण का भाव प्रेषित करने के लिए ही प्रतिपादित है। त्रिव्यवस्था को सुदृण करने

लिए हमारी नैतिक जिम्मेदारी

होनी चाहिए कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो हमे मतदान के

दिन अपने काम काज को छोड़ कर अपने मत का प्रयोग करना चाहिए मतदाताओं को जागरूक करने के लिए “सभी चुने,सही चुने” की मुहिम

एक सराहनीय प्रयास भी है।आपका एक मत राष्ट्र को सशक्त बनाएगा आप सब मतदाता हमारे लोकतंत्र की ताकत है राष्ट्र हित में सजग नागरिक बनकर अपने मत का प्रयोग कीजिए।

भारतीय संविधान के अनुसार देश में नियमित,स्वतंत्र एवम निष्पक्ष चुनाव आयोजित करने का अधिकार निर्वाचन आयोग को प्राप्त है। भारत के नागरिकों को मतदान करने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती वल्कि एक निश्चित आयु पूर्ण कर लेने के बाद उन्हें मतदान करने के लिए पात्र माना जाता है।पहले भारत में मतदान करने की आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई थी लेकिन 61वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से मतदान करने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18वर्ष की गई यानि कि अब 18 वर्ष पूर्ण कर लेने बाला प्रत्येक भारतीय नागरिक मतदान करने के लिए पात्र होगा । वोट देना हमारा अधिकार ही नही नैतिक कर्तव्य भी है।हमारा मत हमारे भविष्य का दर्पण है ।

यही एक ऐसा अधिकार है जो हर वर्ग,समाज ,गरीब,अमीर सबके लिए समान है।इसकी गरिमा को समझे और मताधिकार का उपयोग कर राष्ट्र को सशक्त बनाए।

एक मत की कीमत(शक्ति) को समझकर राष्ट्र हित में किया गया मतदान लोकतंत्र के महापर्व में पूर्णाहुति ही है।

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