ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझाने के लिए शुरू हुआ ‘पृथ्वी 2026 – पैलियोसाइंस फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया’

Update: 2026-07-23 12:47 GMT


23 से 25 जुलाई तक वैज्ञानिकों, फिल्मकारों, पत्रकारों और शिक्षाविदों का राष्ट्रीय संगम

लखनऊ, 23 जुलाई 2026 :धरती, आकाश और पाताल की उत्पत्ति और विस्तार की अबूझ पहेलियों को समझने और सुलझाने के उद्देश्य से बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी), लखनऊ में गुरुवार को तीन दिवसीय 'पृथ्वी 2026 – द पेलियोसाइंस फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया एवं नेशनल डायलॉग ऑन अर्थ साइंस कम्युनिकेशन' का भव्य शुभारंभ हुआ। फिल्म महोत्सव का उद्घाटन बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आरके मित्तल ने किया। उद्घाटन समारोह में बीएसआईपी के निदेशक डॉ. महेश जी ठक्कर, डॉ. शिव कुमार शर्मा (राष्ट्रीय संगठन सचिव, विज्ञान भारती), सुजाता मेहता (बॉलीवुड अभिनेत्री एवं थिएटर कलाकार), श्री महेश झा (हेड, डीडब्ल्यू हिंदी, डॉयचे वेले, जर्मनी) तथा डॉ. मुकेश शर्मा (पूर्व महानिदेशक, फिल्म्स डिवीजन, भारत सरकार एवं पूर्व एडीजी, प्रसार भारती) विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि "फिल्मों और दृश्य माध्यमों के जरिए वैज्ञानिक तथ्यों तथा पर्यावरण से जुड़े विषयों को समाज के व्यापक वर्ग तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने ऐसे आयोजनों को वैज्ञानिक चेतना विकसित करने तथा युवाओं को शोध और नवाचार की ओर प्रेरित करने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया।"

विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. शिव कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव से ही अत्यंत प्रगतिशील रही है| हमारे साहित्य में पृथ्वी हमारी माता कही गई हैं| अनादिकाल से ही भारतीय ऋषि-मुनियों ने ब्रह्माण्ड के रहस्यों को सुलझाने का प्रयास किया है| हाल के दिनों में फिल्म जगत ने इस दिशा में प्रयास तो किया है लेकिन इस दिशा में अभी और अधिक काम होने की जरुरत है|

प्रसार भारती और फिल्म्स डिवीज़न के पूर्व महानिदेशक डॉ. मुकेश शर्मा ने सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों का जिक्र किया| उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम आम लोगों के बीच वैज्ञानिक चेतना का प्रवाह होता है|

संस्थान के निदेशक डॉ. महेश जी ठक्कर ने कहा कि जब सिनेमा और विज्ञान का मिलन होता है तब वह प्रयोगशाला से निकला ज्ञान सर्व समाज को सुलभ हो जाता है|

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया डॉयचे वेले (हिंदी), जर्मनी के प्रमुख महेश झा ने कहा कि वैश्विक स्तर पर तो विज्ञान आधारित फिल्मों का प्रदर्शन होता रहता है लेकिन भारतीय सिनेमा को अभी इस दिशा में अभी बहुत काम करना बाकी है| अगर आज हम युवाओं और विद्यार्थीं को इस तरह के आयोजनों में शामिल करेंगे तो वह कल को बेहतर ‘साइंस कम्यूनिकेटर’ बनेंगे|

पृथ्वी विज्ञान, पेलियोसाइंस, पर्यावरण संरक्षण तथा विज्ञान संचार जैसे विषयों को जन-जन तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की दिशा में यह आयोजन एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। फेस्टिवल का उद्देश्य पृथ्वी के प्राचीन इतिहास, जीवाश्मों, जैव विविधता, पर्यावरण तथा पृथ्वी विज्ञान से जुड़े विषयों को फिल्मों और संवाद के माध्यम से सरल, रोचक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ समाज के समक्ष प्रस्तुत करना है। साथ ही युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करना, उन्हें विज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना तथा शोध और समाज के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करना भी इस आयोजन का प्रमुख लक्ष्य है। यह महोत्सव विज्ञान, सिनेमा और जनसंचार के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में उभरने का प्रयास है। इस राष्ट्रीय आयोजन में देश-विदेश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, फिल्म निर्माताओं, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, विज्ञान संचारकों तथा विद्यार्थी ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया|

फेस्टिवल बुक का विमोचन, 'फॉसिल मेमॉयर्स' से हुआ फिल्म प्रदर्शन का आगाज़

उद्घाटन समारोह के दौरान फेस्टिवल बुक तथा 'पेलियोसाइंसेज' का विमोचन किया गया। इसके बाद वरिष्ठ विज्ञान फिल्मकार नंदन कुध्याड़ी द्वारा निर्मित उद्घाटन फिल्म 'फॉसिल मेमॉयर्स' का प्रदर्शन किया गया। फिल्म में जीवाश्मों और पृथ्वी के प्राचीन इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसे उपस्थित वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों एवं अन्य प्रतिभागियों ने रुचिपूर्वक देखा। उद्घाटन फिल्म के अतिरिक्त चुनिंदा वृत्तचित्रों की एक विशेष श्रृंखला भी प्रदर्शित की गई। इन फिल्मों के माध्यम से पृथ्वी विज्ञान, पर्यावरण, प्राकृतिक विरासत तथा वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े विविध विषयों को सहज, आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। इन प्रस्तुतियों ने विज्ञान संचार में फिल्मों की उपयोगिता और उनकी प्रभावशीलता को भी रेखांकित किया।

वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की रही सक्रिय भागीदारी

फेस्टिवल के पहले दिन देश के विभिन्न शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों से आए वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, मीडिया प्रतिनिधियों तथा फिल्मकारों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। पूरे दिन प्रतिभागियों में उत्साह का वातावरण बना रहा। विज्ञान आधारित फिल्मों के प्रदर्शन ने ज्ञान के आदान-प्रदान तथा वैज्ञानिक विषयों पर संवाद के लिए एक सार्थक मंच उपलब्ध कराया। इस आयोजन ने यह भी स्पष्ट किया कि जब विज्ञान, सिनेमा और जनसंचार एक साथ आते हैं, तो वैज्ञानिक विषयों को आम लोगों तक अधिक प्रभावी और रोचक ढंग से पहुँचाया जा सकता है। प्रतिभागियों ने इस पहल को विज्ञान संचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

आठ राष्ट्रीय मास्टर क्लास होंगे विशेष आकर्षण

महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषताओं में देश के प्रतिष्ठित विज्ञान फिल्मकारों और मीडिया विशेषज्ञों द्वारा आयोजित आठ विशेष मास्टर क्लास शामिल हैं। इनमें प्रतिभागियों को विज्ञान फिल्मों की संकल्पना, पटकथा लेखन, दृश्य भाषा, पर्यावरण पत्रकारिता तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित फिल्म निर्माण के आधुनिक आयामों से परिचित कराया जाएगा।

मुख्य मास्टर क्लास में शामिल हैं—

● प्रो. बीरबल साहनी एवं आचार्य पी.सी. राय : सिनेमाई दस्तावेजीकरण — श्री नंदन कुद्याड़ी

● पर्यावरण पत्रकारिता और सतत भविष्य की कहानियाँ — श्री अशोक कुमार (डीडब्ल्यू हिन्दी)

● हाउ नॉट टू मेक अ फिल्म — डॉ. मुकेश शर्मा

● भूवैज्ञानिक शोधपत्र से डॉक्यूमेंट्री पटकथा तक — श्री लतेश पनचारिया शाह

● द डर्टी क्लाउड : कृत्रिम बुद्धिमत्ता का पर्यावरणीय पक्ष — श्री ओ.पी. श्रीवास्तव

● को-क्रिएटिंग विद एआई — सुश्री सुभा दास मोल्लिक

● अंटार्कटिका से हिमालय तक : कठिन परिस्थितियों में विज्ञान फिल्मांकन — श्री राकेश राव

● भू-दृश्यों की कहानी : भू-पर्यटन के लिए फिल्म निर्माण — श्री प्रांतिक सांतरा।

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