लखनऊ, 28 सितंबर 2026: ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के तत्वावधान में ‘प्रगतिशील उर्दू महिला कहानीकार और सामाजिक चेतना’ विषय पर एक विस्तार व्याख्यान का आयोजन अबुल कलाम आज़ाद अकादमिक भवन के हाइब्रिड हॉल, द्वितीय तल पर किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. मोहम्मद अकमल ने परिचयात्मक वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष प्रो. अजरा आबिदी का स्वागत किया तथा विषय की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस अवसर पर प्रो.अज़रा आबिदी ने विस्तार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए प्रगतिशील उर्दू कहानी की परंपरा और उसमें महिला कहानीकारों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील आंदोलन ने उर्दू साहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित रखने के बजाय उसे समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिला कहानीकारों ने स्त्री, परिवार, वर्गीय असमानता, आर्थिक शोषण, घरेलू उत्पीड़न, शिक्षा, सामाजिक प्रतिबंधों और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को अपनी कहानियों का विषय बनाया और इन समस्याओं के पीछे मौजूद सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक कारणों को भी समझने का प्रयास किया। प्रो.अज़रा आबिदी ने कहा कि सामाजिक चेतना का अर्थ केवल सामाजिक समस्याओं की पहचान करना नहीं है, बल्कि यह समझना भी आवश्यक है कि ये समस्याएँ क्यों उत्पन्न होती हैं, इनके कारण क्या हैं और सत्ता के कौन-कौन से तंत्र इन्हें बनाए रखते हैं। प्रगतिशील कहानीकारों ने स्त्री की समस्याओं को केवल निजी या व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय उन्हें व्यापक सामाजिक संरचना से जोड़ा।

उन्होंने रशीद जहाँ, इस्मत चुगताई, रज़िया सज्जाद ज़हीर और हाजरा मसुर्र की कहानी लेखन का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कहानीकारों की रचनाओं में स्त्री केवल एक पीड़ित या देखी जाने वाली व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अनुभव और चेतना के साथ ‘देखने वाली व्यक्ति’ के रूप में सामने आती है। उनका मूल योगदान यही है कि उन्होंने सदियों से पुरुष की दृष्टि से देखी जाने वाली स्त्री को स्वयं अपनी दृष्टि से दुनिया, समाज और पुरुष को देखने का अवसर प्रदान किया।

विस्तार व्याख्यान के समापन पर प्रो. सौबान सईद ने व्याख्यान के विभिन्न पहलुओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रो. अजरा आबिदी ने प्रगतिशील महिला कहानीकारों के कथा-पाठों को एक नए दृष्टिकोण से डिकोड किया है, जिसके परिणामस्वरूप इस विषय को लेकर हमारे मन में कई नए प्रश्न उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि प्रो. अज़रा आबिदी ने इन कहानीकारों के कथा-पाठों के अंतर्निहित संदर्भों को समकालीन स्त्री-संबंधी समस्याओं और प्रश्नों से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि रशीद जहाँ, इस्मत चुगताई, रज़िया सज्जाद ज़हीर और हाजरा मसुर्र ने अपने समय में जो प्रश्न उठाए थे, वे आज भी बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ हमारे समाज में किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। इन प्रश्नों पर गंभीर और खुले दृष्टिकोण से चर्चा की आवश्यकता है, ताकि अतीत के साहित्यिक अनुभवों को समकालीन सामाजिक समस्याओं से जोड़कर नए वैचारिक आयाम विकसित किए जा सकें। विस्तार व्याख्यान के पश्चात शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने महत्वपूर्ण प्रश्न किए, जिनका प्रो. अजरा आबिदी ने संतोषजनक उत्तर दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मूसा रज़ा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ज़फरुन नक़वी ने प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर डॉ. मुर्तज़ा अली अतहर, डॉ. आज़म अंसारी, डॉ. अब्दुल हफ़ीज़, डॉ. मुनव्वर हुसैन, डॉ. सिद्धार्थ सुदीप, डॉ. हैदर मेहदी, डॉ. ज़िया जाफ़री, डॉ. आयशा फ़ातिमा शहनाज़, डॉ. मुज़म्मिल करीम, डॉ. मुदस्सिर, डॉ. अख़लाक़ और डॉ. अब्दुर्रहमान के अलावा विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।