विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए रचनात्मक कौशल जरूरी : प्रो. पुनीत बिसारिया
झांसी।विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए पाठ्यक्रम आधारित ज्ञान के साथ रचनात्मक एवं सृजनात्मक कौशल का विकास भी आवश्यक है। रचनात्मकता विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, मौलिक चिंतन और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करती है। यह विचार बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कला संकाय अधिष्ठाता एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. पुनीत बिसारिया ने व्यक्त किए।
वे तार सप्तक के मूर्धन्य कवि एवं प्रसिद्ध समालोचक विजयदेव नारायण साही की जयंती के अवसर पर हिंदी विभाग के वृंदावनलाल वर्मा सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। संगोष्ठी का विषय ‘विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में रचनात्मक कौशल की भूमिका’ रहा।
प्रो. बिसारिया ने विजयदेव नारायण साही के साहित्यिक अवदान को याद करते हुए कहा कि साही नई कविता के महत्वपूर्ण कवि होने के साथ-साथ जायसी के प्रतिष्ठित समालोचक भी थे। उन्होंने साहित्य के माध्यम से परंपरा, संस्कृति और सामाजिक चेतना को नई दृष्टि प्रदान की। साही का मानना था कि समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से जुड़े रहना चाहिए। साहित्य की रचनात्मकता इन्हीं मूल्यों को समयानुकूल अभिव्यक्ति देकर समाज को दिशा देती है।
उन्होंने कहा कि आज शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना या डिग्री प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों में कल्पनाशीलता, स्वतंत्र चिंतन, संवेदनशीलता और सृजनात्मक अभिव्यक्ति का विकास भी उतना ही जरूरी है। रचनात्मक गतिविधियों में सहभागिता विद्यार्थियों को अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने का अवसर देती है।
डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी ने कहा कि सफलता एक दिन में प्राप्त नहीं होती, लेकिन निरंतर प्रयास करने वाला व्यक्ति एक दिन लक्ष्य तक अवश्य पहुंचता है। उन्होंने कहा कि रचनात्मकता व्यक्ति को नए विचारों के साथ आगे बढ़ने, समस्याओं का समाधान खोजने और असफलताओं से सीखते हुए पुनः प्रयास करने की प्रेरणा देती है।
संगोष्ठी में डॉ. अचला पाण्डेय, डॉ. नवीन चंद पटेल, डॉ. प्रेमलता, डॉ. सुधा दीक्षित तथा डॉ. द्युति मालिनी ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को साहित्य, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना आवश्यक है। इससे उनका मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक विकास संतुलित रूप से होता है।
वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि रचनात्मक कौशल विद्यार्थियों को केवल बेहतर विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक बनाने में भी सहायक होता है। साहित्य और कला जैसी गतिविधियां विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, संवाद क्षमता और सामाजिक समझ को विकसित करती हैं।
इस अवसर पर मनीष मंडल, गिरजा शंकर कुशवाहा, रितु कुशवाहा, वैष्णवी कुशवाहा, रोहित कुमार, साहिल कुमार, सृष्टि यादव, सचिन, आकांक्षा, राहुल, खुशी, मोहित, हिमांशु, दीपक, महक, शालिनी एवं करिश्मा सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन बीए ऑनर्स प्रथम सेमेस्टर की छात्रा करिश्मा राजपूत ने किया, जबकि वंदना रायकवार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।