महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा ‘महाकाव्य के रूप में वाल्मीकि रामायण: ऐतिहासिक विमर्श’ विषय पर विशेष व्याख्यान कुलपति प्रो अजय तनेजा के संरक्षण में आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता श्री अमित वर्मा, आईजी ने रामायण के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आयामों पर विचार प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम की आयोजक एवं इतिहास विभागाध्यक्ष तथा सामाजिक विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष डॉ. पूनम चौधरी ने स्वागत वक्तव्य में रामायण को प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परंपराओं और राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत बताया। समन्वयक डॉ. मनीष कुमार ने इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए नैतिक मूल्यों, सुशासन और सामाजिक समरसता के महत्व को रेखांकित किया। मुख्य वक्ता श्री अमित वर्मा ने रामायण के कालक्रम, पाठ्य संरचना और इतिहासलेखन से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा की। उन्होंने पुरातात्विक साक्ष्यों, प्राथमिक स्रोतों और ग्रंथ में वर्णित खगोलीय विवरणों के संदर्भ में विभिन्न ऐतिहासिक दृष्टिकोणों का विश्लेषण किया तथा प्राचीन प्रशासनिक व्यवस्थाओं की वर्तमान संदर्भों में प्रासंगिकता स्पष्ट की।

व्याख्यान में रामायण के साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्व, लोकजीवन, नारी विमर्श, भारतीय सिनेमा में इसके रूपांतरण तथा वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की विविधता पर चर्चा हुई। विशेष रूप से सबाल्टर्न इतिहासलेखन के अंतर्गत निषादों, वनवासी समुदायों और अन्य उपेक्षित समूहों के प्रतिनिधित्व एवं सामाजिक भूमिका पर विमर्श किया गया। प्रश्नोत्तर सत्र में प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने पाठ्य भिन्नताओं तथा इतिहासलेखन की पद्धतियों से जुड़े प्रश्न उठाए। श्री वर्मा ने उनके उत्तर देते हुए प्राचीन महाकाव्यों के अध्ययन में वस्तुनिष्ठ एवं अंतर्विषयी शोध दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम का समापन डॉ. पूनम चौधरी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।