पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के दौरे में गंभीर प्रोटोकॉल चूक और राज्य सरकार की लापरवाही ने संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गैर जिम्मेदाराने रवैये को एक बाऱ फिर उजागर किया है।
राष्ट्रपति के कार्यक्रम में गंभीर प्रोटोकॉल चूक और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नदारद रहना, यह साबित करता है कि पश्चिम बंगाल में संवैधानिक गरिमा की अनदेखी का सिलसिला जारी है। हालिया घटना न केवल देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा पर चोट है, बल्कि यह आदिवासी समाज और नारी शक्ति का भी खुला अपमान है।
राष्ट्रपति के अपमान ने बंगाल में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में भाग लेने के बाद विधाननगर में संथाल समाज के लोगों के बीच पहुंचीं राष्ट्रपति ने प्रशासनिक व्यवस्था पर तो सवाल उठाए ही, साथ ही सीएम ममता बनर्जी के नदारद रहने पर भी सवालिया निशाना लगाया।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी शामिल होना चाहिए था, सर्वोच्च संवैधानिक पद पर इस अवहेलना को सहने के बावजूद राष्ट्रपति ने बड़ी ही सहजता और भावुकता के साथ सीएम ममता बनर्जी को अपनी बहन बताते हुए कार्यक्रम में उनकी गैर मौजदूगी को लेकर निराशा जाहिर की।
हालांकि ममता बनर्जी ने न तो बतौर सूबे की मुखिया होने के नाते और न ही मानवीय आधार पर कोई सम्मानजनक प्रतिक्रिया देना तक उचित समझा। वहीं हमेशा शालीन और शांत रहने वाली राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु घटना से इतनी आहत हुईं कि उन्हें राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करनी पड़ी।
प्रोटोकॉल के अनुसार, राष्ट्रपति के लिए हमेशा उच्चतम सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है लेकिन पश्चिम बंगाल की घटना न केवल एक प्रशासनिक चूक को दिखाती है, बल्कि राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा का उल्लंघन करने की हठधर्मिता को भी साफ दर्शाती है जिसे टस से मस होने के लिए न तो सीएम और न हीं उनका प्रशासन किसी कीमत पर तैयार है।