सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सत्र न्यायालय यानी ट्रायल कोर्ट उम्रकैद की सजा सुनाते समय अपने आदेश में यह शर्त नहीं जोड़ सकते कि दोषी को ‘मरते दम तक जेल में रहना होगा’।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 302 में उम्रकैद की सजा के साथ इस तरह की कोई विशेष शर्त निर्धारित नहीं की गई है। ऐसे में ट्रायल कोर्ट अपनी ओर से सजा की अवधि को इस तरह नहीं बढ़ा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल संवैधानिक अदालतों यानी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ही कानून के दायरे में रहते हुए सजा की ऐसी नई श्रेणी निर्धारित करने का अधिकार है। ट्रायल कोर्ट को कानून में निर्धारित सजा के दायरे में ही फैसला देना होगा।
पीठ ने यह भी कहा कि जहां संसद का इरादा उम्रकैद को बिना किसी छूट के दोषी की पूरी जिंदगी तक लागू करने का रहा है, वहां कानून में इसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है। उदाहरण के तौर पर 2018 में IPC की धाराओं 376AB, 376DA और 376DB में स्पष्ट प्रावधान किया गया था कि दोषी को अपनी शेष जिंदगी जेल में रहना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 302 में इस तरह का स्पष्ट प्रावधान मौजूद नहीं है। इसलिए ट्रायल कोर्ट उम्रकैद की वैधानिक सजा में अपनी ओर से ऐसी अतिरिक्त शर्त जोड़कर उसे कानूनी रूप से उचित नहीं ठहरा सकते।