देवनागरी सुलेख की बारीकियों से रूबरू हुए 100 विद्यार्थी

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देवनागरी सुलेख की बारीकियों से रूबरू हुए 100 विद्यार्थी
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कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स में देवनागरी सुलेख की कलात्मक बारीकियों से विद्यार्थियों को परिचित कराने के उद्देश्य से तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के प्रेरणादायी मार्गदर्शन में स्कूल ऑफ क्रिएटिव एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स की ओर से 14 से 16 अक्टूबर तक ‘फाउंडेशन्स ऑफ फॉर्म्स: मास्टरी इन देवनागरी कैलीग्राफी’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में लगभग 100 विद्यार्थी प्रतिभाग कर रहे हैं। कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को देवनागरी लिपि की कलात्मक संरचना, सुलेख की तकनीकों और टाइपोग्राफी एवं ग्राफिक डिजाइन के व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी देना है।

कार्यशाला में द कैलीग्राफी फाउंडेशन के मेंटर अभिषेक वर्धन सिंह विद्यार्थियों को देवनागरी अक्षरों की बनावट, स्ट्रोक तकनीक, अक्षरों के अनुपात, रेखांकन और संतुलन का प्रशिक्षण दे रहे हैं। व्यावहारिक अभ्यास के माध्यम से विद्यार्थी अक्षरों की संरचना, उनकी लयात्मकता और दृश्य प्रभाव को समझ रहे हैं। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताया जा रहा है कि पारंपरिक अक्षर-लेखन की कला का उपयोग आधुनिक टाइपोग्राफी और ग्राफिक डिजाइन में किस प्रकार किया जा सकता है।

निरंतर अभ्यास से निखरती है कलात्मक दक्षता

इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स के निदेशक डॉ. मिठाई लाल ने कहा कि कला के किसी भी क्षेत्र में दक्षता हासिल करने के लिए निरंतर अभ्यास, सूक्ष्म अवलोकन और तकनीकी समझ आवश्यक है। सुलेख केवल अक्षरों को सुंदर ढंग से लिखने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें रेखाओं, अनुपात, संतुलन और रचनात्मक अभिव्यक्ति का विशेष महत्व होता है। इस तरह की कार्यशालाएं विद्यार्थियों को भारतीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के साथ ही समकालीन डिजाइन की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने में सहायक हैं।

परंपरा और आधुनिक डिजाइन का संगम

कार्यशाला की संयोजक सुश्री तनिशा वाधवान तथा सह संयोजक डॉ. रणधीर सिंह और विनय सिंह ने बताया कि इसमें करीब 100 विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया है। कार्यशाला के माध्यम से विद्यार्थियों में भारतीय लिपि एवं दृश्य संस्कृति के प्रति रुचि विकसित करने के साथ सुलेख, टाइपोग्राफी और ग्राफिक डिजाइन के क्षेत्र में उनकी रचनात्मक एवं व्यावहारिक दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी कलात्मक विशेषताओं को समझना और आधुनिक डिजाइन में उनका प्रभावी उपयोग करना विद्यार्थियों के लिए उपयोगी साबित होगा।

कार्यशाला विद्यार्थियों को पारंपरिक अक्षर-लेखन की तकनीकों से परिचित कराने के साथ उन्हें नए प्रयोग करने और अपनी रचनात्मक सोच को विकसित करने का अवसर भी प्रदान कर रही है।

इस अवसर पर विभाग के संकाय सदस्य डॉ. राज कुमार सिंह, जे. बी. यादव, डॉ. विजय त्रिपाठी, डॉ. मंतोष यादव, सुश्री प्रिया मिश्रा और सुश्री कीर्ति वर्मा सहित अन्य शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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