भारतीय ज्ञान परंपरा और विरासत संरक्षण को मिलेगा नया आयाम, KMCLU और चंबल आर्काइव्स न्यास के बीच ऐतिहासिक समझौता
लखनऊ। भारतीय ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक दस्तावेजों, दुर्लभ पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती...

लखनऊ। भारतीय ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक दस्तावेजों, दुर्लभ पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती...
लखनऊ। भारतीय ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक दस्तावेजों, दुर्लभ पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय (KMCLU), लखनऊ ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय और भारतीय इतिहास, पारंपरिक कलाओं तथा दुर्लभ अभिलेखों के संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत चंबल आर्काइव्स न्यास के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस समझौते से भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge Systems-IKS), पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, ऐतिहासिक अभिलेखों के संरक्षण तथा अंतरविषयक अकादमिक एवं शोध गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा, कुलसचिव श्री विकास, वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार, प्रो. हैदर अली तथा डॉ. नीरज शुक्ला उपस्थित रहे। इस महत्वपूर्ण साझेदारी को विश्वविद्यालय के अकादमिक, शोध एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस साझेदारी का प्रमुख उद्देश्य भारत की समृद्ध बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक के माध्यम से संरक्षित करना तथा उसे विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अकादमिक जगत के लिए अधिक सुलभ बनाना है। इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय और न्यास संयुक्त रूप से पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, अभिलेखीकरण, शोध परियोजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और शैक्षणिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करेंगे।
चंबल आर्काइव्स न्यास के उपाध्यक्ष माधवेंद्र पोरवाल ने इस समझौते को विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि इस सहयोग से दुर्लभ ऐतिहासिक एवं साहित्यिक सामग्री को संरक्षित करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और उस पर शोध करने का अवसर मिलेगा।
पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण पर विशेष जोर
समझौते के तहत विश्वविद्यालय में उपलब्ध तथा विभिन्न क्षेत्रों में बिखरी हुई दुर्लभ पांडुलिपियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पहचान, वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं अभिलेखीकरण की दिशा में कार्य किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, भाषा विशेषज्ञों और शोधार्थियों को चंबल आर्काइव्स के संग्रह और अभिलेखीय संसाधनों के माध्यम से शोध एवं अध्ययन के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।
इस सहयोग के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणाली, पारंपरिक कला, इतिहास, साहित्य, भाषाओं और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े विषयों पर कार्यशालाएं, व्याख्यान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अकादमिक गतिविधियां भी आयोजित की जाएंगी। इससे विद्यार्थियों को पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक अभिलेखीय एवं संरक्षण तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी मिल सकेगी।
दुर्लभ रामायण और ऐतिहासिक ग्रंथों का भी होगा संरक्षण
चंबल आर्काइव्स न्यास के संग्रह में अयोध्या से संबंधित एक दुर्लभ एवं ऐतिहासिक रामायण संस्करण सहित अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक ग्रंथ मौजूद हैं। प्रस्तावित सहयोग के माध्यम से ऐसे दुर्लभ ग्रंथों के डिजिटलीकरण और अकादमिक अध्ययन की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा। इससे भारतीय साहित्यिक परंपरा, धार्मिक ग्रंथों के ऐतिहासिक स्वरूप तथा भाषाई एवं सांस्कृतिक विकास के विभिन्न पहलुओं पर शोध को प्रोत्साहन मिलेगा।
‘बुक बडी’ पहल से विद्यार्थियों तक पहुंचेगी ज्ञान की पहुंच
चंबल आर्काइव्स न्यास की सामाजिक एवं शैक्षणिक पहलों में ‘बुक बडी’ (Book Buddy) कार्यक्रम भी विशेष महत्व रखता है। इस पहल के अंतर्गत उपयोगी पुरानी शैक्षणिक पुस्तकों का संग्रह कर उन्हें जरूरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाता है। पुस्तकों के पुनः उपयोग और चक्रीय वितरण पर आधारित यह पहल शिक्षा के संसाधनों को अधिक से अधिक विद्यार्थियों तक उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। इस तरह की पहल विद्यार्थियों में पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ शैक्षणिक अवसरों को अधिक समावेशी बनाने में सहायक है।
कुलपति के दूरदर्शी नेतृत्व के प्रति जताया आभार
इस महत्वपूर्ण समझौते के अवसर पर चंबल आर्काइव्स न्यास के उपाध्यक्ष माधवेंद्र पोरवाल ने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कुलपति के मार्गदर्शन, सकारात्मक दृष्टिकोण और अकादमिक सहयोग की भावना से इस महत्वपूर्ण साझेदारी को आकार देने में मदद मिली है।
उन्होंने इस समझौते को मूर्त रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रो. हैदर अली और डॉ. नीरज शुक्ला के अकादमिक योगदान एवं प्रयासों की भी सराहना करते हुए उनके प्रति आभार प्रकट किया।
यह समझौता ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के अकादमिक एवं अनुसंधान क्षेत्र के विस्तार के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। विश्वविद्यालय और चंबल आर्काइव्स न्यास की यह सहभागिता अतीत की अमूल्य धरोहरों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने तथा भारतीय इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर नए शोध के अवसर विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।





