पं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर भाषा विश्वविद्यालय में हुआ एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सामूहिक वंदेमातरम् का आयोजन
पं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के पं. दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ द्वारा विश्वविद्यालय के अटल...

पं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के पं. दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ द्वारा विश्वविद्यालय के अटल...
पं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के पं. दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ द्वारा विश्वविद्यालय के अटल सभागार में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सामूहिक वंदेमातरम् का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में एकात्म मानव दर्शन एवं वसुधैव कुटुंबकम् की प्रासंगिकता” रहा।
कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक वंदेमातरम् के गायन के साथ हुई। वंदेमातरम् के संदर्भ एवं महत्व पर डॉ. योगेंद्र कुमार सिंह ने परिचयात्मक उद्बोधन दिया। इसके पश्चात संगोष्ठी का औपचारिक शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो अजय तनेजा ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की चर्चा करते हुए एकात्म मानव दर्शन की अवधारणा और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा समग्र मानव कल्याण, सामाजिक समरसता और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समन्वय की भावना को महत्व देती है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को वैश्विक शांति, सहयोग और मानवीय मूल्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता प्रख्यात वक्ता एवं चिंतक संजय ने अपने संबोधन में पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन की मूल अवधारणाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एकात्म मानव दर्शन केवल आर्थिक या राजनीतिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित विकास की अवधारणा प्रस्तुत करता है। उन्होंने व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और व्यापक मानवता के बीच परस्पर संबंध तथा दायित्व की भावना को इस दर्शन का महत्वपूर्ण पक्ष बताया।
संजय ने भारतीय चिंतन परंपरा में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय दृष्टि में समूची मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की परंपरा रही है। उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बढ़ती परस्पर निर्भरता के संदर्भ में संवाद, सहयोग, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर उत्पन्न विभिन्न चुनौतियों के बीच ऐसे विचारों पर विमर्श आवश्यक है, जो व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने के साथ-साथ व्यापक मानव कल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान कर सकें। उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन को भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि और सामाजिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि एकात्म मानव दर्शन में विकास को केवल भौतिक समृद्धि के संदर्भ में नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के समग्र कल्याण के संदर्भ में देखने पर बल दिया गया है। उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं से भारतीय ज्ञान परंपरा एवं समकालीन वैश्विक चुनौतियों के बीच संबंधों को समझने तथा इन विषयों पर गंभीर अकादमिक विमर्श करने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथि जिला उपभोक्ता आयोग, सीतापुर के सदस्य देवकान्त त्रिपाठी ने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सामाजिक समरसता, मानवीय मूल्यों, परस्पर सहयोग और विश्वबंधुत्व की भावना को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा के ये विचार आज के समय में भी महत्वपूर्ण हैं। डॉ. अम्बेडकर विश्वविद्यालय के प्रो. बी.डी. शुक्ल ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, विचार और दर्शन पर प्रकाश डालते हुए उनके सामाजिक एवं राष्ट्र चिंतन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को भारतीय समाज और संस्कृति की मूल अवधारणाओं से जोड़ते हुए उनके समकालीन महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के अंत में संयोजक डॉ. अंशुल पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। संचालन डॉ नीरज शुक्ल ने किया. कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के कुलसचिव विकास, वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार, सह-संयोजक डॉ. मनीष कुमार, आयोजन सचिव डॉ. नलिनी मिश्रा, डॉ. राजकुमार कुमार सिंह और डॉ. अनामिका सिंह सहित सभी शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे.





