भारतीयता केवल परंपरा नहीं, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का व्यापक स्वरूप : प्रो. संजीव कुमार
मसुविवि में ‘भारतीयता की नई परिभाषा : वैश्विक मंच पर युवा पीढ़ी और हमारी सांस्कृतिक विरासत’ विषय पर संगोष्ठीआजमगढ़। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय...

मसुविवि में ‘भारतीयता की नई परिभाषा : वैश्विक मंच पर युवा पीढ़ी और हमारी सांस्कृतिक विरासत’ विषय पर संगोष्ठीआजमगढ़। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय...
मसुविवि में ‘भारतीयता की नई परिभाषा : वैश्विक मंच पर युवा पीढ़ी और हमारी सांस्कृतिक विरासत’ विषय पर संगोष्ठी
आजमगढ़। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय में मंगलवार को दैनिक जागरण की ओर से ‘भारतीयता की नई परिभाषा : वैश्विक मंच पर युवा पीढ़ी और हमारी सांस्कृतिक विरासत’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ वेदमंत्रों के उच्चारण से हुआ। संगोष्ठी में साहित्य, लोक जीवन, संचार माध्यमों और बदलते सामाजिक परिवेश के संदर्भ में भारतीय पहचान पर वक्ताओं ने विचार रखे।
कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि भारतीयता किसी एक परंपरा या सांस्कृतिक प्रतीक तक सीमित नहीं है। यह विविधता में एकता, सहिष्णुता, समन्वय और मानवीय संवेदनाओं से निर्मित जीवन-दृष्टि है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में युवाओं के सामने दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने के अनेक अवसर हैं। ऐसे में अपनी जड़ों, भाषा, साहित्य और मूल्यों की समझ उन्हें अपनी पहचान को मजबूती से प्रस्तुत करने का आधार देती है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का उपयोग करते हुए भारतीय जीवन-दृष्टि को व्यापक स्तर पर सामने लाया जा सकता है। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व की भावना विकसित करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
रामानंद सरस्वती पुस्तकालय की कार्यकारी निदेशक हिना देसाई ने कहा कि किसी समाज की स्मृतियों और अनुभवों को सुरक्षित रखने में पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साहित्य और इतिहास से जुड़कर विद्यार्थी अपने अतीत और वर्तमान के बीच संबंध को समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच पुस्तकालयों और पठन संस्कृति को नए स्वरूप में प्रोत्साहित करना जरूरी है, ताकि ज्ञान की परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
लोक दायित्व के संयोजक पवन सिंह ने लोक जीवन को भारतीय पहचान का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि लोकगीत, लोककथाएं, लोकभाषाएं, लोकनृत्य और पारंपरिक कलाएं पीढ़ियों के अनुभवों को संजोए हुए हैं। आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए इन परंपराओं को जीवित रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को लोक विरासत से जोड़ने के लिए शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के सहायक आचार्य डा. दिग्विजय सिंह राठौर ने कहा कि वैश्वीकरण और डिजिटल संचार ने भारतीय विचार एवं विरासत को व्यापक समाज तक पहुंचाने के नए अवसर दिए हैं। मीडिया के माध्यम से साहित्य, कला, लोक परंपराओं और सामाजिक सरोकारों को नई पीढ़ी से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी विरासत को केवल जानने तक सीमित न रखकर उसे रचनात्मक ढंग से आगे बढ़ाने की भूमिका निभानी चाहिए। डा. राठौर ने स्वागत भाषण भी दिया।
कार्यक्रम में दैनिक जागरण आजमगढ़ के ब्यूरो चीफ मोहन राव ने कुलपति प्रो. संजीव कुमार का सम्मान किया। कुलपति ने हिना देसाई, पवन सिंह और डा. दिग्विजय सिंह राठौर को दैनिक जागरण द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘शब्दार्थ’ भेंट कर सम्मानित किया।कार्यक्रम का संचालन अंशिता सिंह ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार सौरभ सिंह, विश्वविद्यालय के शिक्षकगण एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। संगोष्ठी में बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय पहचान और विरासत को लेकर विचारों का सार्थक आदान-प्रदान हुआ।कार्यक्रमके आयोजन में डॉ. शिवेंद्र सिंह ,डॉ.सौरभ सिंह,डॉ.भंवर लालऔर डॉ. विजय प्रकाश उपाध्याय की अहम् भूमिका रही |





