मेरी तीन कहानिया -भाग आठ - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की कथा

मेरी तीन कहानिया -भाग आठ -    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की कथा

ब्रोचा हॉस्टल बीएचयू



बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में जाने के बाद कुछ मन हल्का हुआ और दोस्तों के बीच रह कर घर से दूर, माँ की मौत से दूर भाग जाने का मन हो गया था | अब निश्चित किया की घर से नही, बीएचयू के हॉस्टल में रह कर पढेंगे | हालाकि प्रवेश परीक्षा में नम्बर काफी थे पर शहर का होने के नाते और समाज विज्ञान में हॉस्टल की कम सीटो के कारण हॉस्टल नही मिला |

तय किया की किसी भी तरह अब हॉस्टल में रहना है | रास्ता मिला और अपने एक और मित्र,आमोद पाण्डेय, जो स्कूल के ज़माने से हमारे साथ थे , उनका प्रवेश साइंस में था और उनके पास वही ब्रोचा छात्रावास में हॉस्टल भी था |

उनके साथ जो छात्र रहता था वो किसी और के कमरे में सेट हो चुका था, तो हम भी ब्रोचा के कमरा नम्बर २२७ में सेट हो गए | अब जिन्दगी पटरी पर आ रही थी | सोशल साइंस के छात्र का साइंस के लोगो से मिलना जुलना बढ़ गया | उसी दौरान जियोलॉजी में पढ़ रहे संजय प्रसाद से भी भेट हुई |

हम सब सुबह नाश्ता कर अपने अपने विभाग चले जाते थे | हमारा विभाग मनोविज्ञान काफी अच्छा था | चुकि बीए में लड़के और लडकियों के लिए अलग अलग व्यवस्था है और एमए में वो साथ साथ पढ़ते थे तो हम लोगो का सामना सीधे हमारे सीनियर लडकियों से हुआ और देखते ही प्यार हो जाने का सिलसिला जो चल पड़ा की आगे चल कर कोई भी हाथ नहीं लगी |

अभी एक से एक तरफ़ा प्यार चल ही रहा था की दूसरी सुंदर लड़की के चक्कर में दूसरा फिर तीसरा और अंतहीन सिलसिला चल पड़ा | इस यात्रा में हम और हमारे मित्र प्रशांत एक जैसे थे | कभी राजनीति शास्त्र के एमए की लडकियों के पीछे तो कभी इस बात का अफ़सोस की इतनी सुंदर शिक्षिका का तलाक क्यों हो गया |

इन सब के बीच एकाएक चुनाव की घोषणा हो गयी | अभी हम अपने कमरे में पहुचे थे की आठ दस लोग हमें पकड़ कर भगवान दास हॉस्टल में ले गए | लगा की आज तो काम हो गया |

कुछ बड़ा हुआ है जिसके कारण आज हम लोगो की जान जायेगी | पर अंदर कमरे में एक नेता जी थे और उनके आठ दस चमचे | उस समय नेता जी का जलवा था | वो थोडा लंगड़ा कर चलते थे और देखते समय उनकी आँख नहीं खुलती थी | बाद में पता चला की उनको राजेश सिंह भूरिया , भूरी आँख के कारण , बुलाया जाता था |

खैर नेता जी ने कहा की हम लोग दुसरे रूम में शिफ्ट हो जाए क्योंकि उस रूम को उनका चुनाव का कार्यालय बनाया जाएगा | अपना तो कुछ था नहीं जो था वो आमोद पाण्डेय का था | अब मरता क्या न करता हम लोग भाभा हॉस्टल के एक कमरे में कुछ दिन के लिए शिफ्ट हो गए |

वो दिन भी क्या दिन थे बीएचयू के | मुन्ना भाई की तरह हॉस्टल में कई कमरे एक साथ कब्ज़ा किये नेता और न तो वार्डन का डर न पुलिस का | राज सिर्फ नेता लोगो का चल रहा था | बीएचयू का वो दौर बड़ा खतरनाक था | जहाँ एक ओर पढाई ठीक थी वही दूसरी ओर वहां एक समानांतर सत्ता चल रही थी, जो छात्र नेताओ के हाथ में थी |

क्रमश

बाकी अगले भाग में


Next Story
Share it