मेरी तीन कहानियां : भाग नौ , बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय कथा

मेरी तीन कहानियां : भाग नौ , बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय कथा


बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दिन तेजी से बीत रहे थे | अब स्मृति से माँ की यादें मिट सी रही थी | उनका स्थान दोस्तों ने ले लिया था | संजय प्रसाद, आमोद पाण्डेय, अश्विनी पाण्डेय, शशांक जैसवाल, सनोज अब जीवन के अभिन्न अंग थे | जिन्दगी में दोस्तों का भी बटवारा था | एक वो दोस्त थे जिनके साथ भारतीय शिक्षा मंदिर से पढ़े और वो वही छूट गए | उनका साथ मोहल्ले के साथ ही छूट गया | इसमें नीरज, विजय, नरेन्द्र , प्रदीप, विवेक , अन्नू, बबलू , संजू कुछ लोग जो विश्वविद्यालय की पढाई के दौरान कही पीछे छूट गए | कुछ आकर मिल जाते और कुछ शिकायत करते रहते |

विश्वविद्यालय में जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण चीज थो वो मेरी यामाहा मोटरसाइकिल | न जाने कितने दोस्तों ने मेरी मोटर साइकिल का इस्तेमाल कर गंगा पार कर गए - इन्ही में से एक है संजय प्रसाद - सोशल साइंस में अपने सहपाठी के रूप में लडकिया तो पढ़ती नहीं थी | ये भाई साहेब एक दिन बोले की चलो आज लंच करते है जिसमे मेरी दोस्ते है | ख़ुशी –ख़ुशी अपनी गाड़ी से लोगो को रेस्टुरेंट तक ले गए पर सारा श्रेय संजय भाई ले गए और तो और जिस लंच में मेरा कुछ न था वहा भुगतान भी करना पड़ा |

ऐसे में पहले साल की परीक्षा आ गयी और अपने अश्विनी भाई जो सारे साल लडकियों के साथ ड्रामा खेलते रहे वो परीक्षा हाल में रो पड़े | हम लोगो ने कहा की कुछ लिख लो पर नियम के पक्के नकल नही मारंगे भले परीक्षा में रोना पड़े | ऐसे में हमारे एक और मित्र आनंदेश्वर सहारा बने और उन्होंने अश्विनी को कुछ ज्ञान की बात भगवान बुद्ध की तरह समझाई और उनका कल्याण किया |

विश्वविद्यालय में पढने को लेकर हम लोगो का एक समूह तैयार हो गया और हम लोगो को लगा की केन्द्रीय पुस्तकालय का समय कम है तो बैठ गए आन्दोलन पर और उसे रात के बारह बजे तक खुलवा दिया |

अब उस पुस्तकालय में रात के बारह बजे तक हम चार पांच लोग और दस से बारह हमें कोसते हुए पुस्तकालय के स्टाफ | पर नौजवानी का गुरुर कुछ कर गुजरता है और हम लोग भी बारह बजे तक पढ़ कर अपनी –अपनी साइकिल उठाई और चल दिए लंका गेट की ओर जहाँ पहलवान की दूकान पर एक –एक लौंगलता और कढ़ाई पर चढ़ कर पूरी तरह खौलता हुआ दूध जो अब तरल से ठोस हो रहा था उसका एक ग्लास, राबड़ी दाल कर हम लोगो को दिव्य आनंद की अनुभूति देता था |

वक्त क्या है ये समझ से परे था - दिन और रात की परिभाषा कहीं पीछे छूट चुकी थी | अब जो था वो मित्रो का साथ और पढने और नोट्स बनाने का जनून | लगा की पढने का सही मतलब तो यही आकर सिखा |

तभी एक दुखद घटना हुई हमारे रूम पार्टनर आमोद पाण्डेय के दादा जी का स्वर्गवास हो गया | उनकी तेरही में शामिल होने के लिए हम लोग गोपी गंज गए | वहाँ पुड़ी सभी निपटा कर रात में चले और अपनी अपनी गाडियों से निकल पड़े | मेरे साथ सनोज चौधरी थे और दूसरी बाइक पर शशांक जैसवाल | राजातालाब के कुछ आगे रुके और मीठा पान का एक बीड़ा जमाया | हम लोगो ने तय किया की प्रशांत आगे चलेंगे और हम लोग उनके पीछे क्यंकि हमारी गाड़ी की लाइट कभी जल रही थी तो कभी बुझ जाती थी |

हम लोग राजा तालाब के पास पहुचे थे की प्रशांत की गाड़ी पीछे रहा गयी और हम लोग की यामाहा नब्बे की स्पीड से किसी चीज से टकरा गई | ये दुर्घटना एकाएक लाइट के बंद होने और राजातालाब बाजार में लाइट के चले जाने से हुआ |

उस समय होश नहीं था की क्या हुआ, किससे टक्कर हुई | वहां लोग इक्कठा हो गए थे | सनोज भाई को चोट नहीं लगी थी पर वो बेहोश से लग रहे थे | मेरा सारा बदन सड़क की गिट्टियो से छिल गया था | अभी अपने आप ओ संभालता की देखा घुटने में जींस फटी है और छेद से मांस का बड़ा भाग बाहर आ गया था |

खैर हार न मानने की आदत और मुसीबत में माँ के आशीर्वाद का विश्वास हमें खड़े होने का साहस दे रहा था | बगल में एक कम्पाउंडर साहब थे जिनके पास लोग लेकर आये | उन्होंने ढिबरी की रौशनी में कहा की सिलना पड़ेगा और बिना अगल बगल सुन्न किये सीधे सीधे उन्होंने मोटी सुई से मेरे घुटने के मांस को अंदर कर सिलना शुरू कर दिया |

सनोज भाई ये देख बेहोश हो गये| मैंने शशांक से उनको सँभालने के लिए कहा | दर्द की इन्तहा थी पर अपने आप को सैनिक मान उस दर्द को पी गया और उस अँधेरी गुफा से जब अपना घुटना सिलवा कर बाहर निकला तो देखा की अब भी सनोज भाई बेहोश से थे |

अब समस्या ये थी की वहां से गाड़ी कौन चलाये सनोज भाई गाड़ी चलाना जानते थे पर उनकी हालत ख़राब | मै घुटने पर लगे टाँके के कारण पैर नहीं मोड़ सकता था | इस मुसीबत में पुनः एक बार ईश्वर का नाम ले सनोज भाई को पीछे बिठा बिना लाइट की मोटर साइकिल पर जवानी फिर जीवन को चैलेन्ज करते निकल पड़ी |

पूरा राश्ता किसी तरह कटा और जब बीस मिनट का सफर घंटो में पूरा कर घर पहुचे तो सिर्फ एक ही बात मन को बताई की आइन्दा ये न कहना की कितनी देर में कहाँ पहुचोगे ये तो सिर्फ ईश्वर तय करता है | हमने दुस्साहस किया और बीस मिनट का सफर घंटो में तय किया |

क्रमश:


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