मां की याद में……….डा प्रविता त्रिपाठी

मां की याद में……….डा प्रविता त्रिपाठी

मां की याद में……….

डा प्रविता त्रिपाठी

मां-:

मां शब्द से ही सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन हुआ है,मां संतुलन,सहनशीलता,और सृजन का पर्याय है,एक बार मां के रूप में खुद को देखिए,समूर्ण माताओं का खुद के रूप स्वयं में बोध कीजिए तब समझेंगे कि समर्पण की भावना के साथ जिंदगी जीना कितना कठिन,और किस कदर महत्वपूर्ण है यदि हम सभी अपनी मां का सम्मान नहीं करते तो यह प्रकृति का अपमान है,मां शब्द सुनने में जितना आसान है उसे समझना उतना मुश्किल है,मां हमारे जीवन की आधार थी ,मां के बिना जीवन बेकार है एक मां ही है जो हमारी हर ख्वाहिशों को पूरा करती,हमारी पसंद न पसंद सब के बारे में समझ जाती,जब मैं इस दुनिया में आई तब कुछ नही जानती थी वह मां ही थी जिन्होंने हमारा पालन पोषण करके बढ़ा कर हमे इस संसार में आगे आने,समझने जानने के काबिल कर एक शक्तिशाली इंसान बनाया ताकि मैं अपना मुकाम खुद हासिल कर सकू।

ईश्वर हमारे पास आ नही सकता ,इसी लिए नारी के रूप में मां को इस पृथ्वी पर भेजा ताकि मां हमारे सुख दुख का ख्याल रख सके। मां अनमोल है जिसका कोई मोल नहीं,मां ही हमारी पहली शिक्षक है।

"जिंदगी की पहली शिक्षक मां पहली दोस्त मां।

जिंदगी भी मां,जिंदगी देने बाली भी मां।"

जब हम पहला शब्द बोलते तो मुख से मां ही निकलता,मां ही हमे सही राह पर चलने का मार्ग सिखाती अच्छे बुरे की समझ सिखाती,मेरी मां अपने सारे सपने छोड़कर मेरे लिए सब करती थी,चाहे जितनी गलती हुई हो हमसे हमारी हर गलती को माफ करती थी।मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण हिस्सा मेरी मां ही थी और मेरी सच्ची दोस्त भी मेरी मां ही थी…..मां के जाने के बाद आज मैं मां की याद अपने आप को बहुत अकेला महसूस करती हूं।

"मां के बिना जिंदगी वीरान है,

तन्हा सफर में हर राह सुनसान

जिंदगी में मां का होना जरूरी है,

मां की दुआओं से ही हर मुश्किल आसान होती है।।"

मां से ही हमारा वजूद था ,मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊ पर मां के लिए बच्ची ही थी आज 5 सितंबर शिक्षक दिवस पूरे देश दुनिया के लिए एक खुशी और हर्षोल्लास ,सम्मान का दिन होता है पर इसी दिन 5 सितंबर 2018 को सुबह 5 बजे ईश्वर ने मेरी पहली शिक्षक मेरी मां को मुझसे और दुनियाअलग कर दिया। मैं इस दिन को कभी नही भूल सकती जो मेरे जीवन में अंधकार लाने वाला दिन था मेरे लिए यह दिन जितना सम्माननीय और खुशी का है उतना ही गम का है। मुझे परिवार के सभी सदस्य से प्रेम है पर आज चार साल बीत जाने के बाद भी सबसे अधिक मां से ही प्रेम है दोस्तों अगर आपके पास मां नहीं है तो आपका जीवन ,परिवारअधूरा सा होता है।

"मां के बिना तरसती हू मै।

बचपन की सारी यादें अपने दिल में रखती हूं मैं।

मां को कैसे भुल जाऊ, अपने आप सिमटती हूं मैं। वो आंचल की छांव कहा,मां बिना भटकना है जीवन।"

दोस्तों मां के बिना परिवार की कल्पना नही की जा सकती है,एक मां ही होती है जो हमे प्रेम करने में अपना कोई स्वार्थ नही देखती,हमारे सुख दुख ,पढ़ने ,लिखने,खाने, पीने ,बैठने उठने आने जाने ,हमारी हर पीड़ा को समझना, एक मित्र के रूप में सारी बातें शेयर करना सभी का ध्यान रखती थी मां।वो अपने स्वास्थ्य का ध्यान न रखते हुए हम सभी का ध्यान रखती थी।आज मैं कही भी घर से बारह जाऊं मन में ख्याल आता है कि घर जाकर मां से बताऊंगी हर बात पर घर में प्रवेश करते ही एक वीराना सा लगने लगता। सोच में पड़ जाती हू ईश्वर आपने ये क्या किया किसे वोलू मैं मन की सारी बातें।मां के हम पर इतने परोपकार होते है यदि हम सभी पूरा जीवन मां की सेवा में लगा दू वो भी कम ही है। मां का कोई विकल्प नहीं है उनकी कीमती हमे तभी समझ आती है जब वो हमारे पास भी नहीं होती है।

"चलती फिरती आंखो से,

अंजान देखी हैं।मैने जन्नत तो नही अपनी मां देखी है।"

आज मेरी और परिवार तरफ से मां की चौथी पुण्य तिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

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