रुक तो सकता नही उसे तो चलते जाना है, चलना ही जिंदगी है और मौत ही ठिकाना है

रुक तो सकता नही उसे तो चलते जाना है, चलना ही जिंदगी है और मौत ही ठिकाना है

जिंदगी आज लाचारी और बेबसी का रूप है ,हर ओर फैली मायूसी, उदास चेहरे , हमसे कुछ मांगते है ,जिन्दगी तो दे न सके अब मौत तो गले लगाने दो |

हमने चंद ख़ुशी के लम्हों के लिए अपने आपको गिरवी रख दिया - अपनों की उम्मीदों को पाले इस शहर में कदम रखा था | क्या माँगा था ,चंद रूपये जो तुम मेरे हर लम्हों को लेकर दे रहे थे | मेरे अपनों के वक़्त को बेचकर मै उन्हें पालने की कोशिश कर रहा था | पर आज इस शहर ने हमें फिर निराश किया | जिसे अपना पूरा जीवन दिया उसी ने मरने को छोड़ दिया |

ये हालत सिर्फ मेरे नहीं है | मेरे जैसे बहुतेरे मिल जायेंगे | कोई थापा , कोई रामू , कोई मोहन हर गली में दिख जायेंगे | ये कहानी नयी नहीं है बस इसके पात्र नए मिल जायेंगे | हर बार जब ऐसी आफत आती है तो कही किसी कोने में दर्द में कराहते हुए मुंशी प्रेमचंद का कोई पात्र मिल जाता है |

कहानी अमर होती है पात्र हमारे जीवन में अपनी छाप छोड़ जाते है और हम जाने अनजाने उन्हें ही जीते चले जाते है | अजीब मंजर है पांच साल की मासूम की निगाहे सवाल कर रही है - माँ ये तो पराये है पर तुम कैसी हो की अपने कोमलांगी को पांच सौ किलोमीटर की यात्रा पैदल कराने निकली हो |

क्या निराशा इतनी हावी हो चुकी है की उस मासूम का दर्द हमे नहीं हो रहा है | क्या मानवता इतनी संगदिल हो चुकि है की इन्हें जीव कहलाने का हक़ भी नहीं रहा है | दर्द से भरे ये कोमल पाँव की हर चित्कार हमें धिक्कारती है | हम इस कोरोना से बच भी गए तो मानवता तो मर ही जायेगी |

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