ज्यादा सफाई से भी होती है बीमारी

अंकिता सिंह-
अपने आसपास सफाई रखना अच्छी बात है। इस तरह बहुत सारे हानिकारक बैक्टीरिया को पनपने और उनसे पैदा होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है। मगर कई लोगों में साफ-सफाई एक सनक का रूप ले लेती है। वे बार-बार हाथ धोते, दिन में कई बार नहाते और कपड़े बदलते, घर में कई बार पोंछा लगाते, धूल-मिट्टी साफ करते, बार-बार उंगलियों से रसोई की फर्श, खाने की मेज वगैरह पर धूल के कण जांचते देखे जाते हैं।
यह दरअसल, एक प्रकार का मनोविकार है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब व्यक्ति के मन में साफ-सफाई का विचार घर कर लेता है, तो वह एक आदत का रूप ले लेता है और वह उसे बार-बार दुहराता रहता है। ऐसे मनोविकार को "आॅब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर यानी ओसीडी कहते हैं"।
ऑब्सेसन यानी आवेश और कंपल्सन यानी विवशता या मजबूरी। ऐसे मनोरोगी एक विचार से इस कदर बंध जाते हैं कि वे उसे दोहराते रहते हैं। उनमें संक्रमण का भय, अपने या दूसरों को नुकसान पहुंचने का भय, आक्रामकता, इच्छाओं पर नियंत्रण न होना, अत्यधिक धार्मिक निष्ठा आदि इस मनोविकार के लक्षण हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक भारत में एक करोड़ से ऊपर लोग इस मोनविकार के शिकार हैं।हालांकि बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं कि अधिक साफ-सफाई से हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी अच्छे बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं और फिर उसकी वजह से बीमारियां पैदा होती हैं। एक नए शोध में यह जानकारी सामने आई है कि अधिक साफ-सफाई और संक्रमण आदि से बचने के एहतियाती उपायों के चलते बच्चों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं। इसकी वजह है कि हमारे पेट में पाचन संबंधी गतिविधियों में मदद करने के लिए जिन बैक्टीरिया की जरूरत होती है, वे भी सफाई के कारण समाप्त हो जाते हैं।
जीवाणु दो प्रकार के होते हैं- एक बुरे जीवाणु, जिनके कारण शरीर को तरह-तरह की बीमारियां होती हैं और दूसरे अच्छे जीवाणु जो परोक्ष रूप से शरीर को स्वस्थ रखने में हमारी मदद करते हैं।





