स्तनपान सिर्फ माँ की नहीं, बल्कि परिवार और पूरे समाज की जिम्मेदारी: विश्व स्तनपान सप्ताह पर विशेषज्ञों का संदेश
लखनऊ, 5 अगस्त 2026: हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाए जाने वाले विश्व स्तनपान सप्ताह 2026 के तहत, यूनिसेफ उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और आईसीडीएस, उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर बुधवार को यूनिसेफ के लखनऊ कार्यालय में एक मीडिया संवाद आयोजित किया। "हर बच्चे के लिए स्तनपान: अवसर और चुनौतियाँ" शीर्षक से आयोजित इस संवाद में प्रमुख चिकित्सा विशेषज्ञों और वरिष्ठ सरकारी व यूनिसेफ अधिकारियों ने स्तनपान के महत्व से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत किए, और स्तनपान से जुड़े हस्तक्षेपों, व्यवहारों, तथा जनजागरूकता व सहयोग बढ़ाने में मीडिया की अहम भूमिका पर चर्चा की। संवाद में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कई संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत यूनिसेफ के चाइल्ड प्रोटेक्शन स्पेशलिस्ट मंसूर क़ादरी के स्वागत संबोधन से हुई।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डॉ. मिलिंद वर्धन ने बताया कि प्रदेश में एक्सक्लूसिव स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए सभी 120 सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में इस साल के अंत तक लैक्टेशन मैनेजमेंट यूनिट (एलएमयू) स्थापित हो जाएँगी। फिलहाल 34 एसएनसीयू में एलएमयू सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, जिनके माध्यम से अप्रैल से जुलाई के बीच 11 हजार से ज्यादा नवजात शिशु लाभांवित हुए हैं। 36 अन्य एसएनसीयू में स्टाफ प्रशिक्षित किया जा चुका है — वे भी जल्द काम करने लगेंगी।
डॉ. मिलिंद ने कहा कि बीते तीन-चार वर्षों में एक्सक्लूसिव स्तनपान की दर में आई गिरावट चिंता का विषय है और प्रदेश सरकार ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है। हर बच्चे को माँ का दूध मिले, इसके लिए सभी एसएनसीयू में एलएमयू शुरू करने का फैसला किया गया है और इसके शुरुआती फायदे भी दिख रहे हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6, 2023-24) के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करने की दर एनएफएचएस-5 के 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 43.1 प्रतिशत हो गई है। लेकिन इसी दौरान, छह महीने तक केवल स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) की दर 59.7 प्रतिशत से घटकर 34.6 प्रतिशत रह गई है — जबकि संस्थागत प्रसव बढ़कर 85.9 प्रतिशत हो गए हैं। संस्थागत प्रसव बढ़ने के बावजूद जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू कराने में जितनी प्रगति होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई — यह एक बड़ा खोया हुआ अवसर दर्शाता है।
महाप्रबंधक ने इसी विरोधाभास की ओर सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश में 86 प्रतिशत से ज्यादा संस्थागत प्रसव हो रहे हैं और चिकित्सा संस्थानों में माताओं को स्तनपान के बारे में बताया जाता है — फिर भी सिर्फ 43 प्रतिशत बच्चों में ही जन्म के बाद स्तनपान की शुरुआत हो रही है। और जब 43 फीसदी बच्चों में स्तनपान की शुरुआत हो रही है, तो एक्सक्लूसिव स्तनपान 35 प्रतिशत क्यों रह गया? ये आंकड़े बताते हैं कि स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए पूरे समाज के सहयोग की जरूरत है, ताकि हर माँ को सही जानकारी, समय और सुविधा मिल सके और हर बच्चे को स्तनपान मिले — जो उसका अधिकार है।
केजीएमसी के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. एस.एन. सिंह ने कहा कि स्कूली शिक्षा में स्तनपान की जानकारी शामिल की जाए और लोगों को इसके फायदे बताए जाएँ, तो समाज की सोच बदलेगी। उन्होंने बताया कि एक्सक्लूसिव स्तनपान करने वाला बच्चा डायरिया, निमोनिया और संक्रमण जैसी बीमारियों से बचा रहता है और उसकी आंतें मजबूत होती हैं। माँ का दूध बच्चे के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए बेहद अहम है, इसलिए ऑपरेशन से जन्मे बच्चों को भी माँ के संपर्क में लाकर स्तनपान कराना चाहिए।
केजीएमसी की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल ने कहा कि बच्चे को एक्सक्लूसिव स्तनपान कराने के लिए जरूरी है कि दो बच्चों में तीन साल का अंतर रहे — तभी माँ पहले बच्चे को दो साल तक ध्यान से स्तनपान करा पाएगी। आईसीडीएस की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. अनुपमा शांडिल्य ने बताया कि विभाग की 1.84 लाख आंगनबाड़ी कार्यकत्रियाँ और लगभग इतनी ही सहायिकाएँ ग्रामीण स्तर पर स्तनपान की महत्ता के प्रति जागरूकता फैला रही हैं।
मेदांता के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आकाश पंडिता ने इन्फैंट मिल्क सब्स्टीट्यूट्स (आईएमएस) एक्ट की जानकारी दी। यह एक्ट दो साल तक के बच्चों के लिए विपणन किए जाने वाले खाद्य पदार्थों के किसी भी रूप में प्रचार पर व्यापक प्रतिबंध लगाता है, साथ ही शिशु फार्मूला कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य पेशेवरों और स्वास्थ्य संगठनों को प्रायोजित करने पर भी रोक लगाता है। इसका उल्लंघन आपराधिक अपराध है, जिसमें 2000 से 5000 रुपये तक का जुर्माना और 6 महीने से 5 साल तक का कारावास हो सकता है।
यूनिसेफ के पोषण विशेषज्ञ रबि नारायण पार्ही ने कहा कि स्तनपान हर बच्चे का अधिकार है। कार्यालयों और संस्थानों को इस दिशा में संवेदनशील बनाने की जरूरत है, ताकि कामकाजी महिलाएँ अपने बच्चों को समुचित स्तनपान करा सकें। यदि कार्यस्थलों पर क्रेच और ब्रेस्टफीडिंग कक्ष जैसी सुविधाएँ हों, तो महिला कर्मचारियों की कार्यक्षमता भी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि पैटरनिटी लीव का प्रावधान भी जरूरी है, ताकि पिता भी स्तनपान में माँ का सहयोग कर सकें।
संवाद के इंटरैक्टिव सत्र में मीडिया प्रतिनिधियों के सवालों के जवाब में विशेषज्ञों ने समुदाय में प्रचलित कई भ्रांतियों और गलतफहमियों को दूर किया.
संवाद में यूनिसेफ के हेल्थ ऑफिसर विजय अग्रवाल, कई मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधि, आकांक्षा, कंसल्टेंट, तथा न्यूट्रिशन इंटरनेशनल (एनआई) और सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफार) जैसे विकास क्षेत्र के सहयोगी संगठनों समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने स्तनपान को बढ़ावा देने और इसका संदेश हर माँ व बच्चे तक पहुँचाने की शपथ ली।