लखनऊ विश्वविद्यालय में मूट कोर्ट से सम्बंधित एक विचारगोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसे विवि मूट कोर्ट एसोसिएशन द्वारा सम्पन्न कराया गया। इसका उद्देश्य विधि के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को मूट कोर्ट के विषय से अवगत कराना था। कार्यक्रम का प्रारम्भ संकायाध्यक्ष प्रोफेसर सी.पी.सिंह जी के अभिभाषण से हुआ। उन्होंने बताया कि लखनऊ विश्वविद्यालय का विधि संकाय इंडिया टुडे की रैंकिंग के हिसाब से देश के प्रमुख 10 विधि संकायों में से एक है और हम इसे देश ही नहीं बल्कि विश्व के मानचित्र में सिरमौर बनाने में प्रयासरत हैं। विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ उन्हें विश्व स्तर से अवगत करा कर उनकी उस मेधा को परिमार्जित करना चाहते हैं, जिससे वो इस संकाय की विरासत को बनाये रखें। उन्होंने वक्ताओं का परिचय दिया जिसमें नितिन कुमार, अतिथि शिक्षक, विधि संकाय, लखनऊ विश्वविद्यालय, प्रतीक त्रिपाठी, शोध छात्र, विधि संकाय, लखनऊ विश्वविद्यालय एवं शम्भूनाथ मिश्रा, अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय लखनऊ बेंच रहे।
नितिन कुमार, ने अपने विचारों को रखते हुए मूट कोर्ट के उद्देश्य एवं उसकी उपयोगिता को बताया। हमारे पास ज्ञान होते हुए भी हम अधूरे से प्रतीत होंगे अगर हम उस ज्ञान को समुचित तरीके से व्यक्त करना नहीं जानते। उसी समुचित तरीके को जानने का एक सबसे अच्छा तरीका है मूट कोर्ट। मूट कोर्ट आपमें छिपे एक कुशल अधिवक्ता को मंच पर लाने का एक प्रयास होता है जिसके माध्यम से आप अपनी प्रखर बुद्धि का परिमार्जन करते हैं। अतः मूट कोर्ट ज्ञान एवं वक्तव्य कला के मध्य एक सेतु है।
प्रतीक त्रिपाठी ने बताया कि शोध सभी विधि छात्रों का या उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति के लिए प्रमुख विषय है। बिना शोध के कोई अधिवक्ता एक कुशल अधिवक्ता नहीं बन सकता। एक न्यायाधीश एक कुशल न्यायाधीश नहीं बन सकता। इसी प्रकार अन्य कोई भी एक कुशल व्यक्तित्व को पाने में असमर्थ रहेगा जब तक वो एक अच्छा शोधक नहीं बन पाता और मूट कोर्ट के माध्यम से आप शोधन कला के बारे में ज्ञान को प्राप्त करके विशिष्टता को प्राप्त करते हैं। शोध विधि के किसी भी क्षेत्र में काम आने वाला एक प्रमुख विषय है। मूट कोर्ट के माध्यम से हम शोधनकला को सीखते हैं और उसे परिमार्जित करके विश्व स्तर पर लाने का प्रयत्न करते हैं। एक अच्छा शोध एक अच्छे विद्यार्थी का शीलगुन होता है।
शम्भूनाथ मिश्रा ने मूट कोर्ट में प्रस्तुतिकरण की मेधा को परिलक्षित करते हुए बताया कि सामान्य प्रस्तुतिकरण एवं न्यायालय में प्रस्तुतिकरण में अंतर को सीखने का सबसे अच्छा स्थान है, मूट कोर्ट। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम प्रस्तुतिकरण की मेधा को समझते हैं। न्यायालय में ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे सम्प्रेषित करने का तरीका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रस्तुतिकरण के समय हमें अपने समक्ष उपस्थित बेंच को ध्यान में रखकर अपने विचार रखने होते हैं। कुछ विशिष्ट दिशा-निर्देश का पालन करना होता है और उन दिशा-निर्देश को हम मूट कोर्ट के माध्यम से स्वयं सीखते हैं तथा उनका प्रस्तुतिकरण भी करते हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित छात्रों एवं छात्राओं द्वारा मूट कोर्ट से सम्बंधित प्रश्नों को पूछा गया जिनका निदान तीनों वक्ताओं द्वारा दिया गया। अंत में आभार प्रदर्शन लखनऊ विश्वविद्यालय मूट कोर्ट एसोसिएशन के सदस्य गौरव चावला द्वारा दिया गया।
अराधना मौर्या