कानपुर : छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) में 30 अक्टूबर से एक नवंबर तक आयोजित तीन दिवसीय तीसरे अंतरराष्ट्रीय वेलनेस सम्मेलन (वेलनेस कॉन-2026) में स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विभिन्न विषयों पर देश-विदेश के विशेषज्ञ विचार साझा कर रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य केवल बीमारियों के उपचार तक सीमित न रहकर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा समग्र स्वास्थ्य की अवधारणा को बढ़ावा देना है।

सम्मेलन के छठे सत्र में शुक्रवार को 'आयुर्वेद और ऑटोइम्यून बीमारियां' विषय पर व्याख्यान दिया गया। इसमें मुख्य वक्ता वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य एवं नीमा वुमेन फोरम की सचिव डॉ. वंदना पाठक ने अपने संबोधन की शुरुआत में जॉग्रेन सिंड्रोम (Sjogren’s Syndrome) और आमवात (Rheumatoid Arthritis) के उदाहरण देते हुए बताया कि आयुर्वेद के माध्यम से इन बीमारियों में उपचार और स्वास्थ्य में सुधार सम्भव हैं। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखने और बीमारियों से बचाव के लिए ओजस, व्याधिक्षमत्व और अग्नि का विशेष महत्व है।

डॉ. पाठक ने ऑटोइम्यून बीमारियों के बारे में बताते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र अपने ही स्वस्थ ऊतकों को बाहरी तत्व समझकर उन पर हमला करने लगता है। इससे शरीर में लगातार सूजन और अंगों व ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। वर्तमान में ऐसी 80 से अधिक बीमारियां पहचानी जा चुकी हैं और दुनियाभर में लगभग आठ से दस प्रतिशत आबादी इनके प्रभाव में है। इनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा में इन बीमारियों के लिए कई दवाएं और बायोलॉजिकल उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन इनके कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। ऐसे में आयुर्वेद के सिद्धांतों के माध्यम से बेहतर स्वास्थ्य के उपायों को समझना जरूरी है।

उन्होंने आयुर्वेद के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि पहला ओजस है, जिसे शरीर के सातों धातुओं के सार के रूप में माना जाता है। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातुओं के पोषण के बाद बनने वाला ओजस शरीर की शक्ति, जीवन ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ा है। दूसरा सिद्धांत व्याधिक्षमत्व है, जिसका अर्थ शरीर की रोगों से लड़ने और बीमारी की गंभीरता को कम करने की क्षमता है। वहीं तीसरा सिद्धांत अग्नि है, जो शरीर के पाचन और चयापचय की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

डॉ. पाठक ने कहा कि आयुर्वेद के अनुसार कमजोर पाचन और असंतुलित चयापचय के कारण शरीर में 'आम' नामक विषाक्त पदार्थ का निर्माण होता है। यही आम विभिन्न दोषों के साथ मिलकर आमदोष बनाता है और शरीर के कमजोर हिस्सों में बीमारी को जन्म दे सकता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति, खानपान, रहन-सहन और मौसम के अनुसार उपचार की पद्धति अलग होनी चाहिए। इसलिए सभी मरीजों के लिए एक जैसी उपचार योजना उपयुक्त नहीं होती।

उन्होंने साम और निराम अवस्था के बारे में भी विस्तार से बताया। उनके अनुसार, जब शरीर के दोष आम के साथ मिल जाते हैं, तो उसे साम अवस्था कहा जाता है। इस दौरान मरीज को थकान, शरीर में भारीपन, बुखार जैसा अनुभव और जीभ पर मोटी परत जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में आयुर्वेद के अनुसार लंघन और पाचन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। लंघन में हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन दिया जाता है, जबकि पाचन के लिए ऐसी औषधियों का उपयोग किया जाता है, जो आम को पचाने में सहायक हों।

उन्होंने बताया कि जब शरीर से आम की स्थिति समाप्त होकर निराम अवस्था आती है, तब शोधन चिकित्सा और पंचकर्म की योजना बनाई जा सकती है। निराम अवस्था में मरीज को शरीर में हल्कापन महसूस होता है और जीभ पर जमी परत भी कम हो जाती है। इसके बाद शरीर के पुनरुद्धार के लिए रसायन चिकित्सा और अन्य उपचार पद्धतियों पर विचार किया जाता है।

डॉ. पाठक ने कहा कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। उचित आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, संतुलित जीवनशैली और तनाव से दूरी बनाना भी आवश्यक है। आयुर्वेद में व्यक्ति की प्रकृति और जीवनशैली को ध्यान में रखकर उपचार करने की परंपरा रही है।

सत्र के कार्यक्रम निदेशक प्रो. बीआर त्रिपाठी (लखनऊ) रहे। अध्यक्षता डॉ. जीएस तोमर (प्रयागराज) और डॉ. नीलिमा वर्मा (कानपुर) ने की।