भाषा विवि में हुआ "उत्तर प्रदेश की लोक विरासत के माध्यम से शिक्षण उपकरण के रूप में अभिलेखागार के उपयोग पर" कार्यशाला का आयोजन
लखनऊ, 16 अप्रैल 2026।
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. अजय तनेजा के मार्गदर्शन में व्यवसाय प्रशासन विभाग द्वारा अवध इन्क्यूबेशन फाउंडेशन के सहयोग से “Archives as a Teaching Tool: Makerspace-Based NEP Curriculum Integrating IKS through the Folk Heritage of Uttar Pradesh” विषय पर एक केंद्रित कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम प्रो. सैयद हैदर अली, डीन, वाणिज्य संकाय के संयोजन में व्यवसाय प्रशासन विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. दोआ नक़वी, सहायक आचार्य, व्यवसाय प्रशासन विभाग के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि अभिलेखीय सामग्री केवल संरक्षण तक सीमित न रहकर सक्रिय शिक्षण संसाधन के रूप में भी उपयोगी हो सकती है, विशेषकर जब इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के साथ मेकर्स्पेस आधारित शिक्षण से जोड़ा जाए।कार्यक्रम में कला एवं मानविकी संकाय के डीन प्रो. मसूद आलम तथा वाणिज्य विभागाध्यक्ष एवं विश्वविद्यालय के मुख्य अनुशासक डॉ. नीरज शुक्ला की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम को अकादमिक गहराई एवं प्रोत्साहन प्रदान किया। इसके अतिरिक्त डॉ. युसैराह अहमद, डॉ. हिनादी अकबर, डॉ. अनामिका सिंह एवं डॉ. माधुरी चौहान, सहायक आचार्य, व्यवसाय प्रशासन विभाग भी उपस्थित रहीं।कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री राजर्षि दास, Rarh-Chive नामक डिजिटल अभिलेखागार के संस्थापक एवं क्यूरेटर तथा बनवारीलाल भालोटिया कॉलेज, आसनसोल, पश्चिम बंगाल के केंद्रीय पुस्तकालय के लाइब्रेरियन रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश की लोक विरासत, मौखिक परंपराओं, शिल्प परंपराओं तथा स्थानीय पांडुलिपियों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में समाहित करने के व्यावहारिक उपाय साझा किए। साथ ही उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि किस प्रकार अभिलेखीय अभिलेखों को मेकर्स्पेस आधारित प्रोजेक्ट्स में परिवर्तित कर एनईपी के अनुभवात्मक शिक्षण लक्ष्यों से जोड़ा जा सकता है।
इस कार्यशाला में शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं युवा नवोन्मेषकों ने बड़ी संख्या में सहभागिता की। प्रतिभागियों को कक्षा शिक्षण मॉड्यूल, लोक ज्ञान के डिजिटल संरक्षण तथा सामुदायिक दस्तावेजीकरण को शिक्षण उपकरण के रूप में उपयोग करने की स्पष्ट समझ प्राप्त हुई।कार्यक्रम का समापन एक इंटरैक्टिव प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ। अंत में कार्यक्रम की समन्वयक डॉ. सुषमा एस. मौर्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. मसूद आलम द्वारा श्री राजर्षि दास को प्रशंसा प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। इस प्रकार यह आयोजन विभाग द्वारा अंतर्विषयी शिक्षण, विरासत-आधारित नवाचार तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक और सार्थक कदम सिद्ध हुआ।