पाण्डुलिपियाँ हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर: प्रो अजय तनेजा

Update: 2026-05-14 14:35 GMT


उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार द्वारा अपने 77वें स्थापना दिवस के अवसर पर “भारतीय ज्ञान परम्परा में पाण्डुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन अभिलेखागार के लखनऊ कार्यालय में किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोध संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाषा विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. अजय तनेजा रहे. अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. अजय तनेजा ने कहा कि पाण्डुलिपियाँ हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिनका संरक्षण एवं संवर्धन करना हम सभी का दायित्व है। उन्होंने कहा कि भारत में पाण्डुलिपियों की परम्परा लगभग छह हजार वर्ष पुरानी है, जिसमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान की गौरवशाली विरासत सुरक्षित है.

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में वक्ताओं ने पाण्डुलिपियों एवं अभिलेखों के संरक्षण, भारतीय ज्ञान परम्परा तथा युवा पीढ़ी की भूमिका पर विस्तार से विचार व्यक्त किये। प्रो. सुमन मिश्रा ने कहा कि अभिलेखागार राष्ट्र की स्मृति संस्थाएँ हैं तथा इनके संरक्षण हेतु युवाओं को आगे आना चाहिए। डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने प्राचीन पाण्डुलिपियों को भारत की दृष्टि बताते हुए कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा से सीखना आवश्यक है। प्रो. अरुण कुमार यादव ने अपने व्याख्यान में कहा कि पाण्डुलिपियाँ समाज को ऋषि-मुनियों एवं मनीषियों की परम्परा से जोड़ती हैं। उन्होंने बताया कि बौद्ध ग्रंथ ललित विस्तर में 64 लिपियों का उल्लेख मिलता है तथा प्रथम बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक श्रीलंका में सिंहली लिपि में लिखा गया था।

आज भी अनेक बौद्ध पाण्डुलिपियाँ सुरक्षित हैं, जिन पर शोध कार्य निरंतर जारी है. द्वितीय सत्र में डॉ. सत्यकेतु ने कहा कि पाण्डुलिपियाँ ज्ञान-संरक्षण के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं तथा इनके संवर्धन एवं संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। डॉ. दीप्ति जायसवाल ने कहा कि मध्यकालीन पाण्डुलिपियाँ इतिहास एवं शासन व्यवस्था को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं।

प्रो. अनिल कुमार तथा डॉ. सौरभ मिश्रा ने भारत सरकार द्वारा संचालित “ज्ञान भारतम् मिशन” की सराहना करते हुए कहा कि इस पहल से देशभर की पाण्डुलिपियों को डिजिटल माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पाण्डुलिपियाँ भारतीय ज्ञान परम्परा एवं ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रही हैं। संगोष्ठी में प्रतिभाग करने वाले विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के लगभग 150 छात्र-छात्राओं को प्रमाण-पत्र वितरित किये गये। कार्यक्रम के अंत में निदेशक श्री अमित कुमार अग्निहोत्री एवं सहायक निदेशक संरक्षण श्री विजय कुमार श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

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